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देश के लिए आदर्श हैं शहीद-ए-आजम भगत सिंह

Publish Date: September 28 2017 03:20:42pm

भारत के प्रमुख स्वतन्त्रता सेनानी और देश के लिए मर मिटने वाले शहीद भगत सिंह आज उन सभी युवाओं के आदर्श है जो देश के लिए जीते हैं। अपनी 23 वर्ष की अल्पायु में देश के लिए उन्होंने अपने प्राणों को न्योछावर कर दिया। भगत सिंह ने देश पर कुर्बान होने के लिए अपनी निजी जि़न्दगी का त्याग कर दिया और हंसते- हंसते फांसी पर लटक गये। उनका यह अमर बलिदान देश में आजादी के लिए एक बहुत बड़ी चिंगारी पैदा कर गया जिसका नतीजा 15 अगस्त 1947 को देश का स्वतंत्र होना है। भारत के महान अमर शहीद भगत का जन्म 28 सितम्बर सन 1907 को लायलपुर जिले के बंगा गांव में एक सिख परिवार में हुआ। इनके पिता सरदार किशन सिंह अपने चार भाइयों सहित सेंट्रल जेल में थे। मां विद्यावती की धार्मिक भावना का भगत सिंह पर प्रभाव था। इनके परिवार में देशभक्ति कूट-कूटकर भरी थी। इनकी बड़ी बहन का नाम अमरो था। 13 अप्रैल सन 1919 को अमृतसर में हुए जलियांवाला बाग की घटना का भगत सिंह पर बड़ा प्रभाव पड़ा और इनकी सोच में बड़ा परिवर्तन आया। तब इन्होंने में बाग़ की मिटटी लेकर देश पर बलिदान होने की शपथ ली। इस घटना के समय भगत सिंह सिर्फ 12 वर्ष के थे। वह अपने घर में क्रांतकारी किताबों का अध्ययन करते थे। उन दिनों भारत में 2 प्रमुख विचारों का बोलबाला था। एक महात्मा गांधी जी के अहिंसात्मक विचार और दूसरा क्रांतिकारियों की हिंसात्मक सोच। महात्मा गांधी जी का असहयोग आन्दोलन उन दिनों चरम पर था। तब भगत सिंह इस सोच- विचार में पड़ गये कि आखिर उनको कौन सा रास्ता चुनना है- अहिंसा या क्रांतिकारी विचारधारा।

अन्त में उन्होंने अन्य युवाओं की तरह आजादी के लिए क्रांति का मार्ग अपनाया। नेशनल कॉलेज लाहौर में ये सुखदेव और यशपाल से मिले। तीनों मित्र क्रांतकारी गतिविधियों में भाग लेने लगे। सन 1926 में लाहौर में उन्होंने नौजवान सभा का गठन किया। जिनका उद्देश्य देशभक्ति की भावना जागृत करना, देश को स्वतंत्र करना, आर्थिक, सामाजिक और औद्योगिक आंदोलनों को सहयोग देना, किसान और मजदूरों को संगठित करना था। नेशनल कॉलेज से भगत सिंह कॉलेज़ की पढ़ाई आधी -अधूरी छोड़कर क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लेने लगे और कई क्रान्तिकारी दलों के सदस्य बने। इसी बीच ये कानपूर में क्रांतकारी व देशभक्त गणेश शंकर विद्यार्थी से मिले और उनके साथ मिलकर क्रांतकारी गतिविधियां चलाने लगे। इनको करतार साराभा ने वीर सावरकर की किताब '1857 प्रथम स्वतंत्रता संग्राम' पढने को दी भगत सिंह काफी प्रभावित हुए। इसके बाद भगत सिंह सन 1924 में येरवडा जेल में वीर सावरकर से मिले जो दो क्रांतिकारियों का अद्भुत मिलन था। सावरकर से मिलने के बाद भगत सिंह के आजादी की सोच में बड़ा परिवर्तन आया। सावरकर ने भगत सिंह की मुलाकात चन्द्रशेखर आजाद से कराई और वे उनके दल में शामिल हो गये। भगत सिंह को लाहौर में हिन्दुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन का मन्त्री बनाया गया। इसके बाद काकोरी काण्ड में जब राम प्रसाद 'बिस्मिल' व अन्य 4 क्रान्तिकारियों को फांसी दी गई तो भगत सिंह से यह सहा नहीं गया और उन्होंने अपनी नौजवान पार्टी को हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन में मिला दिया। भगत सिंह जब बी. ए. में पढ़ रहे थे तब इनके पिता ने इनका विवाह करने की सोची।  भगत सिंह ने बताया की उसने तन, मन और धन से देश सेवा की सौगंध खाई है और मैं इस लड़की का जीवन बर्बाद नहीं करना चाहता। इस कारण भगत सिंह ने विवाह से इनकार कर दिया। सन 1928 में जब साइमन कमीशन भारत आया तो उसका पूरा देशभर में बहुत विरोध प्रदर्शन हुआ। भगत सिंह ने लाहौर में साइमन कमीशन के बहिष्कार की योजना बनाई। अंग्रेजों ने प्रदर्शन करने वालों पर लाठी चार्ज किया जिसमे लाला लाजपतराय को गंभीर चोटें आर्इं जिस कारण उनकी मृत्यु हो गयी। 

इस घटना से भगत सिंह को काफी झटका लगा। जिस कारण भगत सिंह ने पुलिस कमिश्नर सांडर्स की हत्या की योजना बनाई। फिर राजगुरु, जयगोपाल व आजाद के साथ मिल कर भगत सिंह ने लाहौर कोतवाली के सामने पुलिस कमिश्नर सांडर्स की गोलियों से उड़ा कर हत्या कर दी और लाहौर से बाहर निकल गये। भगत सिंह को पूंजीपतियों द्वारा मजदूरों का शोषण करना पसन्द नहीं था। इसलिए वे कुछ ऐसा करना चाहते थे जिससे भारतियों की आंखें खुलें और अंग्रेज सरकार में थोड़ा डर पैदा हो। इस कारण भगत सिंह ने दिल्ली की केन्द्रीय एसेम्बली में बम फेंकने की योजना बनायी। इस योजना में यह बात शामिल थी की यह बम ऐसी जगह पर फेंका जायेगा जहां उस समय कोई भी व्यक्ति मौजूद नहीं होगा और किसी का भी कोई नुकसान न हो। उसके बाद अपनी गिरफ्तारी दी जाएगी जिससे अंग्रेज को भारतियों के रोष का अहसास होगा। योजना के तहत इस कार्य के लिए सभी की सहमती से पार्टी द्वारा भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त का नाम चुना गया और निर्धारित दिन के अनुसार 8 अप्रैल सन 1929 में भगत सिंह और बटुकेश्वर ने असेम्बली में बम फेंका और इसके बाद अपने साथ लाये पर्चो को हवा में उछाल कर नारे लगाने लगे। उनके नारे थे- इंकलाब जिन्दाबाद, साम्राज्यवाद-मुर्दाबाद। जब वहां पुलिस आई तो उन्होंने अपनी गिरफ्तारी दी। उन्हें पुलिस द्वारा लाहौर सेंट्रल जेल में रखा गया। 7 अक्टूबर सन 1930 को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी की सजा सुनाई गयी और अपनी फांसी से पहले 3 मार्च को अपने भाई कुलतार को भेजे एक पत्र में भगत सिंह ने लिखा था
उन्हें यह फिक्र है हरदम, नयी तजऱ्-ए़-ंजफ़़ा क्या है ?
हमें यह शौक है देखें, सितम की इन्तहा क्या है ?
दहर से क्यों खफ़़ा रहें, चर्ख का क्या गिला करें।
सारा जहां अदू सही, आओ ! मुकाबला करें।ंंंंं
भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव तीनों क्रान्तिकारियों को 23 मार्च सन 1931 को फांसी दे दी गई। फांसी से पहले तीनों क्रान्तिकारी आपस में गले मिले और हंसते-हंसते फांसी पर लटक गये। फांसी पर जाते समय वे तीनों क्रान्तिकारी यह पंक्तियां गुनगुना रहे थे।
मेरा रंग दे बसन्ती चोला, मेरा रंंग दे।
मेरा रंग दे बसन्ती चोला, माय रंग दे बसन्ती चोला
आज भी देश की जनता उन महान क्रान्तिकारी भगत सिंह को याद करती है जिन्होंने अपनी जि़न्दगी और जवानी भारत मां के लिए कुर्बान कर दी। ऐसे महान राष्ट्र भक्त को हमारा शत-शत नमन
प्रस्तुति: बीएल सिक्का  व गुरचरण सिंह 
 

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