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पराली समस्या

Publish Date: October 06 2017 01:14:46pm

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने एक मामले में 2015 को अपना फैसला सुनाते हुए 'फसलों के अवशेष प्रबंधन के लिए कृषि मंत्रालय द्वारा तैयार राष्ट्रीय नीति 2014 को पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और यूपी द्वारा तैयार की गई योजना से समायोजित कर बिना किसी देरी के लागू करने के आदेश जारी किए थे। इसी आदेश के तहत, एनजीटी ने 1986 के अधिनियम की धारा 15 के तहत पराली जलाने वाले किसानों पर सख्ती करने की छूट भी राज्य सरकारों को दी। इसमें कहा गया था कि अवहेलना करने वाले छोटे किसानों, जिनके पास 2 एकड़ से कम भूमि है, से हर बार पराली जलाने पर 2500 रुपए पर्यावरण मुआवजा वसूला जाए। 2 एकड़ से अधिक लेकिन 5 एकड़ से कम रकबे वाले किसानों से 5000 रुपए हर बार पराली जलाने पर वसूला जाएं और 5 एकड़ से अधिक रकबे वाले किसानों से 15000 रुपए हर बार पर्यावरण मुआवजे के तौर पर वसूले जाएं। एनजीटी ने किसानों पर सख्ती करने के साथ ही राज्य सरकारों की जिम्मेदारी भी तय करते हुए किसानों को पराली की व्यवस्था के लिए मशीनें व उपकरण मुहैया कराने के आदेश दिए। इस आदेश के तहत, 2 एकड़ से कम भूमि वाले किसानों को हैप्पी सीडर जैसे उपकरण मुफ्त में उपलब्ध कराने को कहा गया जबकि 2 एकड़ से अधिक व 5 एकड़ से कम रकबे वाले किसानों को ऐसी मशीनों की कीमत के तौर पर 5000 रुपए देने और 5 एकड़ से अधिक रकबे वालों को 15000 रुपए देने के आदेश दिए गए।'

ग्रीन ट्रिब्यूनल के उपरोक्त आदेश को आधार बनाकर पंजाब सरकार ने 'पंजाब पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (पीपीसीबी) की ओर से भेजे प्रस्ताव को तुरंत लागू करने के आदेश दिए हैं। इसके तहत अब बोर्ड, कारपोरेशन और सरकारी विभागों का कोई भी अधिकारी और कर्मचारी जो खेती करता है या जिसकी अपनी खेतीबाड़ी जमीन है, वह पराली को आगे नहीं लगाएगा। साथ ही वह दूसरों को भी आग लगाने से रोकेगा। अगर वह खुद कोताही करेगा, तो उसके खिलाफ सर्विस नियमों के अनुसार अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। पंजाब पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड ने शिक्षा विभाग पंजाब को जारी पत्र में लिखा है कि कोई भी अध्यापक (सरकारी या प्राइवेट), कर्मचारी अपने खेत में पराली को आग नहीं लगाएगा। अगर वह ऐसा करेगा, तो उसके खिलाफ विभागीय नियमों के अनुसार अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। साथ ही सिंचाई विभाग को भी हिदायत की गई है कि नहरी पटवारियों की ड्यूटी लगाई जाए, ताकि उनके हलके के अधीन पड़ते गांवों व खेतों में पराली को आग न लगे और कोताही करने वाले किसान की रिपोर्ट संबंधित डिप्टी कमिश्नरों को तुरंत की जाए। सहकारिता विभाग पंजाब को लिखा गया है कि प्राइमरी सहकारी सोसाइटियों के सारे मैंबरों को हिदायत की जाए कि वह अपने खेतों में पराली न जलाएं और कोताही करने वाले मैंबर के खिलाफ संबंधित सहकारिता कानून अनुसार कार्रवाई की जाए। पावरकॉम को भी हिदायत की गई है कि विभाग के जूनियर इंजीनियर अपने इलाके के खेतों पर पैनी नजर रखें और किसानों को आग लगाने से रोकने के लिए अहम रोल निभाएं। पराली जलाने वाले किसानों की जानकारी संबंधित डीसी को भेजें। साइंस, टेक्नोलॉजी और वातावरण विभाग के प्रिंसिपल सचिव ने इन हिदायतों की पालना यकीनी बनाने के लिए जिलों के डीसी और सीनियर सुपरिंटेंडेंट पुलिस को भी खत लिखकर हिदायत जारी की है कि वह मिलकर सभी के साथ मीटिंगें करें और इन आदेशों का सख्ती से पालन यकीनी बनाएं।'
गौरतलब है कि पंजाब में 'हर साल 19.7 लाख टन पराली उत्पादित होती है। इसमें से बासमती की 2.7 लाख टन पराली पशु चारे के रूप में प्रयोग हो जाती है, जबकि एक लाख टन पराली का उपयोग पावर प्लांटों व इंडस्ट्री में हो जाता है। केवल 0.60 लाख टन पराली को मशीनों के जरिए खेतों में खपा दिया जाता है। शेष 15.40 लाख टन पराली चोरी-छिपे खेतों में ही जला दी जाती है। पूरे पंजाब में सैटेलाइट से निगरानी करते हुए पराली जलाने वालों से जुर्माना वसूला जा रहा है। प्रति 2 एकड़ 2500 रुपए का जुर्माना लगाया जा रहा है और अनुमान है कि सरकार अब तक 10 लाख रुपए से ज्यादा राशि जुर्माने के रूप में वसूल चुकी है। सूबे के विज्ञान, तकनीकी एवं पर्यावरण विभाग ने अब राज्य सरकार को एक कार्ययोजना बनाकर दी है, जिसके तहत शेष बची पराली को बायोमास बिजली प्लांटों व बायोमास रिफाइनरी में लगाने को कहा गया है।'

इसी तरह 'हरियाणा में किसानों द्वारा गेहूं और धान के सीजन के बाद खेतों में नाड़ (पराली) जलाने की घटनाएं रोकने के लिए दोषियों पर मुकदमें और जुर्माना लगाने की कार्रवाई बदस्तूर जारी है। एक अनुमान के अनुसार प्रत्येक हेक्टेयर भूमि से लगभग 3.5 टन पराली निकलती है। प्रदेश में हर साल 2.46 करोड़ टन कृषि अवशेष निकलते हैं, जिसमें से किसान 90 लाख टन जला देते हैं। हरियाणा में भी गत वर्ष 22 सितम्बर से सैटेलाइट के जरिए पराली जलाने की घटनाओं पर नजर रखी जा रही है। इस बीच, राज्य सरकार ने पराली के प्रबंधन के उपायों के तहत पीपीपी मोज में पराली से गत्ता, हार्डबोर्ड आदि बनाने के उद्योग स्थापित करने का फैसला किया है। सरकार को इसके लिए एक आस्ट्रेलियाई कंपनी से पेशकश भी हासिल हो चुकी है।'


भारतीय किसान यूनियन के लोगों का कहना है कि 'वह अपने खेत में धान की फसल कटने के बाद नाड़ जलाएंगे। उनका कहना है कि जब तक सरकार इसका कोई समाधान नहीं निकालती, किसान नाड़ को आग लगाते रहेंगे, क्योंकि इसके सिवा और कोई हल नहीं है। नेताओं का कहना है कि अगर नाड़ जलाने वाले किसी किसानों के परिवार को तंग किया गया तो सरकार और जिला प्रशासन के खिलाफ तीखा संघर्ष छेड़ा जाएगा। इसकी सारी जिम्मेदारी सरकार की होगी, क्योंकि किसान पहले से ही बदहाली के दौर में से गुजर रहे हैं।'


पंजाब व हरियाणा में पराली व अन्य अवशेषों के जलाये जाने से पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में हवा में प्रदूषण और बढ़ जाता है जो सेहत के लिए हानिकारक है। अब पर्यावरण को बचाने हेतु, दिल्ली में हुई ग्रीन ट्रिब्यूनल के सामने पंजाब सरकार और किसान आमने-सामने खड़े हैं और दोनों के बीच टकराव बढ़ता चला जा रहा है। पर्यावरण को बचाने हेतु पराली जलाने बारे सख्त हुई राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्यूनल ने पंजाब सरकार को फटकार लगाते हुए कहा है कि छोटे किसानों को आर्थिक बोझ के नीचे दबाकर उन्हें पर्यावरण की रक्षा के लिए नहीं कहा जा सकता है। एन.जी.टी. ने किसानों को मुआव•ाा व बुनियादी ढांचा मुहैया करवाने में नाकाम हुई राज्य सरकार को मामले की गंभीरता को देखते हुए इसका तुरंत व उचित समाधान ढूंढने की हिदायत की। जस्टिस स्वतंत्र कुमार की बैंच ने पंजाब सरकार के वकील को उन 10 किसानों की सूची पेश करने को कहा जिन्हें पंजाब सरकार ने ट्रिब्यूनल के आदेश के अनुसार मुफ्त मशीनरी सप्लाई की हो। सुनवाई दौरान किसानों का पक्ष रखते हुए भारतीय किसान यूनियन राजेवाल के अध्यक्ष बलबीर सिंह राजेवाल ने कहा कि पंजाब सरकार किसानों को डराने के अलावा कोई प्रभावी कदम नहीं उठा रही। उन्होंने कहा कि किसानों को धमकियां दी जाती हैं कि आग लगाते समय किसानों पर न केवल पर्चे दर्ज होंगे, बल्कि जुर्माना भी किया जाएगा और उनकी सब्सिडियां भी बंद कर दी जाएंगी। पंजाब सरकार के कौंसिल ने दलील देते हुए कहा कि राज्य सरकार ने पटियाला जिले का कल्लर माजरी गांव गोद लिया है जहां की 390 एकड़ के क्षेत्रफल को एनजीटी की हिदायतों के अनुसार मॉडल प्रोजैक्ट के रूप में पेश करेगी। किसानों ने राज्य सरकार के इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि सरकार चुनिंदा आधार पर कदम उठा रही है।

उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि पंजाब में पराली जलाने को लेकर सरकार व किसान जत्थेबंदियां आमने-सामने खड़ी हैं। आर्थिक दृष्टि से किसान अगर कमजोर है तो पंजाब सरकार का खजाना खाली है। पंजाब सरकार चाहकर भी उपरोक्त मामले में कोई ठोस कदम नहीं उठा पा रही। सरकार को किसानों को डराने या उन पर दबाव बनाने के बजाये किसान जत्थेबंदियों से बातचीत कर कोई स्थाई समाधान ढूंढना चाहिए। समाधान भी ऐसा हो जिससे छोटे किसानों की आर्थिक स्थिति में भी सुधार हो सके। पर्यावरण का मुद्दा अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन खाली पेट और खाली जेब किसान क्या करे? यह बताना तो सरकार का काम है।


-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।

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