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कहां खो गया ठेका कर्मियों का दीवाली का तोहफा

Publish Date: October 17 2017 01:17:02pm

पिछले वर्ष पंजाब के हजारों कर्मचारियों की दीवाली काली हो गई थी। यह कहानी तो पंजाब के दर्द की है पर सच्चाई यह है कि यही पीड़ा पूरे देश के असंख्य कर्मचारी कहीं न कहीं सह रहे हैं, सिसक रहे हैं। वर्ष 2016 के अक्टूबर मास में एक दीवाली आई और बीत गई। दीवाली से पहले पंजाब की ठेके पर काम कर रहे तीस हजार कर्मचारियों के चेहरे पर असली मुस्कान आई थी। उन्होंने एक दूसरे को बधाइयां दीं और छोटे से अनुमान के अनुसार अगर प्रत्येक कर्मचारी ने मुस्कान को साकार रूप देने के लिए बधाई दी ली हो, मिठाइयां बांटी हों तो कम से कम भी तीन लाख रुपये की मिठाई बधाई दे ली गई थी। प्रतीक्षा यह थी कि सरकार के घर से जो लक्ष्मी दीपावली पर इन परिवारों में भेजने की घोषणा की गई है शेष आवभगत, स्वागत, मीठा.नमकीन बांटना.बंटवाना उसके बाद होगा। भाजपा-अकाली सरकार ने ठेके पर काम कर रहे अपने तीस हजार कर्मचारियों को नियमित करने की जो घोषणा की थीए मेरा विषय वही है। समाचार पत्रों में मोटे-मोटे समाचार छपे, तीस हजार कर्मचारियों को दीवाली का तोहफा। यह भी लिखा गया कि कर्मचाारियां दी बल्ले-बल्ले पर सच्चाई यह है कि सरकार ने कर्मचारियों को थल्ले-थल्ले कर दिया अर्थात उनका अपमान कियाए उनको निराश कियाए उनका यह विश्वास तोड़ दिया कि सरकारी घोषणाओं पर भरोसा किया जा सकता है। 

पंजाब में आज भी तीस हजार से ज्यादा कर्मचारी ठेके पर काम कर रहे हैं। शायद शोषित जवानी का यह सबसे बड़ा उदाहरण है। जिस आयु में विवाह करवाना है, परिवार बनाना है, घर गृहस्थी सुसज्जित करनी है उस भरी जवानी में आटा-नमक रखने और रसोई गर्म करने में ही जिस व्यक्ति की सारी शक्तियां खर्च हो जाएं वह कैसे सुरक्षित भविष्य की कल्पना कर सकता हैए कैसे अपने बच्चों के लिए शिक्षा और रोटी का जुगाड़ भी कर सकता है। 

25 अक्टूबर 2016 को पंजाब सरकार ने तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में यह निर्णय लिया कि पंजाब राज्य के विभिन्न विभागो, सोसाइटियों, बोर्डों व कारपोरेशनों में ठेका आधारित काम कर रहे तीस हजार से ज्यादा कर्मचारियों को नियमित करने का तोहफा दिया है। सरकार ने उनकी सेवाओं को रेगुलर कर दिया है। इसमें 11000 शिक्षा विभाग, 7000 स्वास्थ्य विभाग, 4000 स्थानीय निकाय और 1000 मेडिकल शिक्षा विभाग के कर्मचारी तथा अन्य विभागों के कर्मचारी शामिल थे। यह भी कहा गया कि इस फैसले का आउटसोर्सिंग एजेंसियों या ठेकेदारों के पास काम करते अन्य हजारों कर्मचारियों के भविष्य पर अनुकूल प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि यह अब राज्य सरकार के ठेके पर आधारित कर्मचारी होंगेए किसी एजेंसी के नहीं। 

जब मंत्रिमंडल का यह निर्णय गवर्नर महोदय के पास स्वीकृति के लिए पहुंचा तो पलकें बिछाए पंजाब के तीन लाख लोग इस स्वीकृति की प्रतीक्षा करते रहे। इसके पश्चात किसी कानूनी अड़चन को दूर करने के लिए पंजाब सरकार ने इसी कार्य के लिए विधानसभा का एक दिवसीय विशेष सत्र भी बुलाया। फिर क्या हुआए कोई नहीं जानता। 

तीस हजार कर्मचारियों के तीन लाख परिजन निराशा के अंधेरे में गए और यह निर्णय लागू न हो सका। इसके बाद आशा यह बंधी कि चुनावों में कैप्टन अमरिंदर सिंह की सरकार ने ठेके पर काम कर रहे कर्मचारियों को रेगुलर किया जाएगाए यह घोषणा की। सच्चाई क्या है, आज तक कोई नहीं जानता। मेरी जानकारी के अनुसार हाईकोर्ट में रिट दायर की गई। यह रिट पहली सरकार की प्रेरणा से हुई या नई सरकार नया खर्च नहीं उठाना चाहती थी, इसलिए करवाई गई। जानकारी यह भी दी गई थी कि इससे सरकारी कोष पर हजारों करोड़ रुपये का भारी भरकम बोझ पडऩे वाला है, इसलिए टालमटोल की जा रही है। सारी प्रक्रियाओं में एक किरण आशा की है और वह कि वर्तमान पंजाब सरकार के परसोनल विभाग द्वारा जारी पत्र में यह सरकारी घोषणा की गई कि पंजाब मंत्रिमंडल की 18 मार्च 2017 को हुई बैठक में यह निर्णय लिया गया कि सरकार भविष्य में कोई भी भर्ती ठेके पर नहीं करेगी। 

पंजाब के हजारों कर्मचारी और लाखों परिजन वर्तमान सरकार से यह सवाल कर रहे हैं कि अक्टूबर 2016 में मिला हमारा दीवाली तोहफा कहां चला गयाघ् प्रश्न यह भी है कि क्या आज की सरकार वह कमी पूरी कर देगी जो अकाली.भाजपा सरकार नहीं कर पाई, क्या सरकार चलाने वालों में कोई ऐसा संवेदनशील शासकए प्रशासक है जो उस पीड़ा का अनुमान कर सकेगा जो वर्षों तक सरकारी सेवा करने के बाद भी पूरा पेट न भर सकने वाले और अभाव से जूझने वाले इंसान के सीने में दबी है। यह भी सच है कि ये ठेके पर काम करने वाले कर्मचारी कई बार महीनों तक वेतन न मिलने के कारण सड़कों पर संघर्ष भी करते हैंए लाठी भी खाते हैं और भूखे पेट भी गुजारा करते हैं। ये कर्मचारी अपने माता.पिता से और बच्चों से आंख भी नहीं मिला पातेए क्योंकि उनकी कोई भी आवश्यकता पूरी करने में ये असमर्थ हैं।

 
(लेखिका लक्ष्मीकांता चावला पंजाब की पूर्व कैबिनेट मंत्री एवं भाजपा की वरिष्ठ नेत्री है।)

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