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गुजरात चुनाव

Publish Date: October 30 2017 01:39:04pm

9 और 14 दिसंबर को दो चरणों में होने वाले गुजरात विधानसभा चुनाव के परिणाम 18 दिसंबर को हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव परिणामों के साथ ही आएंगे। दोनों प्रदेशों के विधानसभा चुनाव अपने-अपने प्रदेश वासियों के लिए विशेष महत्व रखते हैं लेकिन गुजरात विधानसभा चुनावों को देश की भावी राजनीति को प्रभावित करने वाला माना जा रहा है। ऐसा इसलिए कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की राजनीतिक उड़ान व पहचान गुजरात से ही मिली थी। प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने में मोदी के गुजरात माडल ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। कांग्रेस आज प्रदेश व देश स्तर पर मोदी के गुजरात मॉडल को ही असफल कह रही है। गुजरात के आर्थिक विकास को दी जा रही चुनौती को आधार बनाकर ही नरेन्द्र मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों का राष्ट्रीय स्तर पर विरोध हो रहा है। 

पिछले वर्ष 8 नवंबर को हुई नोटबंदी और इस वर्ष लागू वस्तु एवं सेवा कर जहां देश भर में अपनी व्यवहारिकता को लेकर चर्चा का कारण बना हुआ है, वहीं देश भर के छोटे व मध्यम श्रेणी के व्यापारी और उद्योगपतियों की व्यापारिक कठिनाईयां भी इस कारण बढ़ गई हैं। गुजरात में कपड़ा व्यापारियों ने तो जीएसटी के विरुद्ध एक लंबा संघर्ष भी किया। उस संघर्ष के परिणामस्वरूप गुजरात के कपड़ा व्यापारियों को कुछ राहत देने की घोषणा केन्द्र सरकार ने अवश्य की, लेकिन गुजरात विधानसभा चुनावों में नोटबंदी और जीएसटी दो बड़े मुद्दे आज भी हैं।

हाल ही में कांग्रेसी नेता एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री अहमद पटेल से जुड़े अस्पताल में कथित आईएस आतंकी के पकड़े जाने से कांग्रेस के लिए प्रदेश में मुश्किलें काफी बढ़ गई हैं। कांग्रेस को कटघरे में खड़ा करते हुए भाजपा नेता व केन्द्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा कि हम कहा करते थे कि कांग्रेस का हाथ, भ्रष्टाचार के साथ, लेकिन अब लोग कहेंगे कि कांग्रेस का हाथ, आतंकवाद के साथ। नकवी ने कहा कि सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल उस अस्पताल से जुड़े थे, जिसमें आतंकी नौकरी करते थे। अहमद पटेल ही भरूच अस्पताल के कर्ता-धर्ता थे। उन्होंने कहा कि हम राजनीति नहीं बल्कि राष्ट्रनीति कर रहे हैं। कांग्रेस आतंकियों को संरक्षण देने के मामले में जवाब दे। कांग्रेस मामले में लीपापोती कर रही है। अब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और राहुल गांधी जवाब दें। वहीं, पूर्व केन्द्रीय वित्तमंत्री पी. चिदंबरम ने बीजेपी की ओर से अहमद पटेल का इस्तीफा मांगे जाने पर हैरानी जताई है। उन्होंने कहा कि अहमद पटेल साल 2014 में ही अस्पताल के ट्रस्टी पद से इस्तीफा दे चुके थे।
 
चुनाव के समय एक-दूसरे को पटखनी देने के लिए नित्य नया दांव चला जाता है। कौन से दांव पर विरोधी चित्त हो जाए, इस बारे यकीनी तौर पर कहना तो मुश्किल होता है लेकिन कोई भी बात जब चर्चा में आ जाए तो वह चुनावों को प्रभावित अवश्य करती है जैसे जीएसटी भाजपा के लिए समस्या बन रहा है, जैसे आतंकवाद को कांग्रेस से जोड़कर भाजपा गुजरात में कांग्रेस के लिए परेशानी पैदा कर रही है। गुजरात में विकास के नाम पर मत मांगने वाली भाजपा का कहना है कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उसके विकास माडल को अपना कर गुजरात आज भी विकास पथ पर आगे बढ़ रहा है। पिछले साल राज्य में 336 करोड़ डालर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) आया, जो 2014-15 के 153.1 करोड़ डालर के दोगुने से भी अधिक है। 2015-16 में राज्य में 224.5 करोड़ डालर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आया था। सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) 2015-16 में 9.2 फीसदी बढ़ा था, जबकि 2014-15 में इसकी रफ्तार 7.8 फीसदी रही थी।

इसी तरह 2015-16 में राज्य विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि दर 12 फीसदी रही थी, जो 2014-15 में 8 फीसदी थी। सबसे अधिक तेजी निर्माण खंड में आई थी। दूसरे आर्थिक संकेतकों जैसे राज्य के राजकोषीय घाटे (2 फीसदी से नीचे), सार्वजनिक कर्ज (जीएसडीपी का करीब 18 फीसदी), सामाजिक क्षेत्र पर व्यय (राजस्व व्यय का 42 फीसदी) आदि में मोदी के जाने के बाद कोई बदलाव नहीं हुआ। अलबत्ता राजस्व में सालाना वृद्धि की दर में कमी इकलौती चिंता है। पिछले पांच साल से इसका कांटा इकाई पर अटका है। 2015-16 में इसमें 5 फीसदी और 2016-17 में इसमें 8 फीसदी तेजी आई थी। इनके मुकाबले 2012-13, 2013-14 और 2014-15 में सालाना वृद्धि दर क्रमश: 22,12 और 16 फीसदी रही थी।
2015-16 और 2016-17 में गैर कर राजस्व में भी कमी दर्ज की गई। माना जा रहा है कि वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) और नोटबंदी से इस साल राज्य सरकार के राजस्व पर और चोट लगेगी। गुजरात में नोटबंदी और जीएसटी लागू होने से असंतोष जरूर है, लेकिन कई लोग मोदी के करिशमाई व्यक्तित्व और निर्णय लेने की क्षमता की कमी भी महसूस कर रहे हैं।

गुजरात सरकार के साथ काम करने वाले एक व्यक्ति ने कहा, मोदी बारीक नजर रखते थे। पहले वाइब्रैंट गुजरात समिट से लेकर मोदी के कार्यकाल में हुए अंतिम वाइब्रैंट समिट तक वह बातों जैसे बैठने की व्यवस्था, खाने-पीने का इंतजाम आदि की खबर रखते थे। उन्होंने सब कुछ इतनी आसानी से संभाला कि हम सब अचंभे में पड़ गए। गुजरात मामलों के विशेषज्ञ अच्युत याज्ञिक कहते हैं, मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद गुजरात के आर्थिक विकास में खास अंतर नहीं आया। याज्ञिक मानते हैं कि मोदी का गुजरात मॉडल शीर्ष स्तर के उद्योगपतियों पर केंद्रित था और उन्हें मोदी की नीतियों का फायदा अभी तक मिल रहा है। उन्होंने कहा, प्रशासनिक नियंत्रण में ही फर्क आया है। मोदी का अफसरशाही पर सख्त नियंत्रण था, लेकिन आनंदीबेन पटेल और विजय रूपानी के साथ ऐसा नहीं है।

उपरोक्त तथ्यों को देखते हुए कहा जा सकता है कि गुजरात में आर्थिक विकास तो ठीक ठाक हो रहा है लेकिन इसके साथ प्रशासनिक स्तर पर कमजोर हो रही पकड़ प्रदेश सरकार के लिए परेशानी अवश्य बढ़ा रही है। गुजरात में उद्योग व व्यापार के साथ कृषि क्षेत्र में भी आजकल मंदी का दौर दिख रहा है। इन सब बातों के बावजूद मोदी के प्रति आकर्षण गुजरात में अभी भी बना हुआ है। इसी कारण गुजरात विधानसभा चुनावों में तमाम कठिनाईयों और चुनौतियों के बावजूद भाजपा का पलड़ा भारी दिखाई दे रहा है। सत्य तो परिणाम आने के बाद ही पता चलेगा।  
 


-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।

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