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आरक्षण का आधार

Publish Date: November 07 2017 04:01:28pm

देशभर में आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग को लेकर 9 अगस्त से रथयात्रा निकाल रही अखिल भारतीय क्षत्रिय सभा की रथयात्रा 18 नवंबर को राजघाट दिल्ली में संपन्न होगी और 19 नवम्बर को दिल्ली में तालकटोरा, स्टेडियम में राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन करेगी। 

देश की आजादी के तत्काल बाद संविधान निर्माताओं ने पिछड़ी जातियों के उत्थान हेतु जाति आधारित आरक्षण का प्रावधान संविधान में दिया था, केवल एक सीमित समय के लिए था लेकिन समय बीतने के साथ जहां जाति आधारित आरक्षण का प्रतिशत बढ़ता गया, वहीं आरक्षण स्थाई होता दिखाई दे रहा है। आरक्षण जिस लक्ष्य के साथ लाया गया था, उस लक्ष्य की प्राप्ति भी नहीं हो रही। आजकल देश के सर्वोच्च न्यायालय में आरक्षण को लेकर चर्चा हो रही है। गौरतलब है कि न्यायालय पिछड़ेपन के आंकड़े जुटाने की अनिवार्यता के वर्ष 2006 एम. नागराज मामले को पुनर्विचार के लिए पांच न्यायाधीशों से बड़ी पीठ को भेजे जाने पर सुनवाई कर रहा है। एम. नागराज के फैसले में पांच जजों ने कहा था कि प्रोन्नति में आरक्षण देने से पहले सरकार को आंकड़े जुटाने होंगे कि आरक्षण पाने वाला वर्ग पिछड़ा है और उसका नौकरियों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है। मध्य प्रदेश, त्रिपुरा और बिहार ने एससी-एसटी को प्रोन्नति में आरक्षण और परिणामी वरिष्ठता रद करने के हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी है, लेकिन उनके आड़े एम. नागराज का फैसला आ रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी आरक्षण में क्रीमीलेयर न होने पर सवाल उठाया है। कोर्ट ने पूछा, क्या एससी-एसटी के सामाजिक व आर्थिक रूप से ऊपर उठ चुके लोग अपने ही वर्ग के पिछड़े लोगों का हक नहीं मार रहे? इस पर बहस के दौरान कोर्ट ने इसे संविधान पीठ को विचारार्थ भेजे जाने के भी संकेत दिए। 

कोर्ट का ध्यान एससी-एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू न होने की ओर गया। जस्टिस कुरियन जोसेफ ने बहस कर रहीं वरिष्ठ वकील इंद्रा जयसिंह से पूछा, एससी-एसटी वर्ग में आरक्षण के सहारे अब ऊपर उठ चुके लोगों को इसका लाभ क्यों मिलना चाहिए? क्रीमी लेयर को लाभ से बाहर क्यों नहीं किया जाना चाहिए? न्यायाधीश आर. भानुमति ने कहा कि जो लोग सामाजिक रूप से ऊपर उठ चुके हैं, उन्हें आरक्षण लाभ क्यों मिले, जबकि उसी वर्ग के लोग उनसे पीछे छुट गए हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि जब तक जाति आधारित भेद समाप्त नहीं हो जाता तब तक आरक्षण जारी रहना चाहिए। आरक्षण को जारी रखने में शायद कम लोगों को आपत्ति है, लेकिन आरक्षण जाति आधारित न होकर आर्थिक आधार पर हो इसकी मांग अधिक है। देश के सर्वोच्च न्यायालय ने भी जाति आधारित आरक्षण का लाभ लेने वालों को अब क्रीमीलेयर मानते हुए आरक्षण के दायरे से बाहर करने पर विचार करने के संकेत ही दिए हैं।

देश की वर्तमान राजनीतिक व सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए जाति आधारित आरक्षण अभी समाप्त नहीं होने वाला और न ही आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया जाने वाला है। हां आरक्षण के लाभ का दायरा और बढ़े तो इसके लिए जाति आधारित आरक्षण का जो परिवार लाभ लेकर आगे बढ़ चुके हैं उन्हें क्रीमीलेयर मान कर उनके परिवारों को आरक्षण के दायरे से बाहर निकाल कर उसी जाति के गरीब व कमजोर परिवारों को लाभ दिया जा सकता है।

वर्तमान में आरक्षण का लाभ दलितों व पिछड़ों में उन्हीं परिवारों को पीढ़ी दर पीढ़ी मिलता जा रहा है जिनकी पहली पीढ़ी को 1950 के दशक में मिला था। उपरोक्त पीढ़ी की भावी पीढिय़ां आज भी आरक्षण का लाभ ले रही हैं। जबकि वह अपनी जाति तो क्या सवर्ण जातियों से भी आर्थिक व सामाजिक रूप से बेहतर हो चुके है। आरक्षण को लेकर संतुलन बनाना हो तो इसके लिए जहां क्रीमीलेयर में आने वालों को बाहर निकाल दिया जाना चाहिए, वहीं 50 प्रतिशत में से 25 प्रतिशत को आर्थिक आधार पर कर देना चाहिए। इससे उन तमाम सवर्ण जातियों के लोगों को लाभ मिलेगा जो हैं तो सवर्ण पर, गरीब और दयनीय स्थिति में रहते हैं। उपरोक्त कदम न तो एक नेता और न  एक राजनीतिक दल उठा सकता है। इस कदम को  उठाने के लिए पहले तो मजबूत इच्छा शक्ति की आवश्यकता है, वहीं सभी राजनीतिक दलों को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सोचने व कर्म करने की आवश्यकता है।  

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