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पुलिस कार्रवाई पर प्रश्नचिन्ह 

Publish Date: November 11 2017 12:25:48pm

नोयडा के आरूषि हत्याकांड के बाद अब गुडग़ांव के रेयान स्कूल के छात्र प्रद्युम्न की हत्या के मामले में पुलिस की कार्रवाई को लेकर कई प्रश्नचिन्ह लगने लगे हैं। आरूषि तलवार की हत्या के लिए उसके माता-पिता तलवार दंपत्ति को पुलिस ने सलाखों के पीछे भेज दिया था लेकिन देश के सर्वोच्च न्यायालय ने तलवार दंपत्ति को आरूषि व हेमराज के कत्ल के मामले में बाईज्जत रिहा कर दिया। न्यायालय अनुसार पुलिस ने हत्या मामले में अपनी सुविधा अनुसार कहानी रच दी और बिना सबूत के तलवार दंपत्ति को जेल भेज दिया। न्यायालय के आदेश के बाद अब तलवार दंपत्ति जेल से बाहर तो आ गए है लेकिन जेल के भीतर गुजरा समय और झेली जलालत के लिए तलवार दंपत्ति किसको जिम्मेवार ठहराए। जनसाधारण भी पूछता है कि आखिर आरूषि और हेमराज का खून किया किसने? पुलिस आज तक इस हत्या मामले को सुलझा नहीं पाई। गुडग़ांव के रेयान स्कूल में हुई प्रद्युम्न के कत्ल के लिए पुलिस ने  एक बार फिर एक गरीब बस कंडक्टर को गिरफ्तार कर तथा छानबीन कर उसे छात्र प्रद्युम्न की हत्या के लिए जि�मेवार ठहराते हुए जेल भेज दिया। अब सीबीआई की रिपोर्ट अनुसार गुडग़ांव पुलिस द्वारा आरोपी बनाया गया बस कंडक्टर बेकसूर है और हत्या के लिए उसी स्कूल के 11वीं कक्षा के एक छात्र को जि�मेवार ठहराया है और छात्र ने अपने पिता के सामने अपने जुर्म को कबूल भी कर लिया है। पंजाब में एक एक नहीं अनेक मामलों में पंजाब पुलिस कटघरे में खड़ी दिखाई दे रही है। पुलिस व समाज का संबंध उस समय से है जब इंसान ने एक स�य समाज की रचना की। समय बीतने के साथ पुलिस समाज का एक अभिन्न अंग बन गई है। पुलिस का लक्ष्य तो अपराधी को पकडऩा ही है। उपरोक्त दोनों मामलों में पुलिस ने जिस तरह मामलों को निपटाने के लिए निर्दोष लोगों को सलाखों के पीछे धकेल दिया, वह अपने आप में एक अजीब मामला तो है ही लेकिन इन मामलों में पुलिस की कार्रवाई तथा कार्य पद्धति दोनों पर प्रश्नचिन्ह लगा दिए हैं। पुलिस चाहे किसी भी प्रदेश की हो, उसकी कार्य पद्धति करीब-करीब एक समान ही दिखाई देती है। डंडे के जोर पर वह बेगुनाह को गुनाहगार बना देती है। आरूषि और प्रद्यु�न जैसे एक नहीं अनेक मामले हैं, जिस पर कार्रवाई के लिए पुलिस स्वयं कटघरे में खड़ी दिखाई देती है।


देश में पुलिस की छवि व साख कितनी खराब हो चुकी है, उसका पता हाल ही में जारी एक रिपोर्ट को पढऩे से पता चल जाता है। रिपोर्ट अनुसार 75 प्रतिशत लोग पुलिस पर विश्वास नहीं करते और पुलिस थाने में रिपोर्ट लिखाने ही नहीं जाते। विशेषतया औरतों का कहना है कि वहां उनके साथ जो व्यवहार होता है, वह अमानवीय होता है। उनकी भाषा आपत्तिजनक होती है। रिपोर्ट अनुसार पुलिस अनपढ़ और गरीब की तो बात भी सुनने को तैयार नहीं होती। पुलिस के व्यवहार के कारण ही उसकी छवि व साख दोनों खराब होते चले जा रहे हैं।  आज के युग में भी पुलिस का व्यवहार अंग्रेजी हुकूमत के समय की तरह हो। समय बदलने के साथ पुलिस में जो सकारात्मक परिवर्तन आने चाहिए थे, वह नहीं आए हैं। सत्ताधारियों ने भी पुलिस का इस्तेमाल अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए करना शुरू कर दिया। परिणामस्वरूप पुलिस भी धड़ेबंदी का शिकार हो गई। पुलिस  कर्मियों की सं�या आवश्यकता से कम है, इस कारण पुलिस हमेशा दबाव में रहती है। अपनी गिरती छवि और साख व अपने पर दबाव को कम करने के लिए आरोपी को अपराधी बना पुलिस अपनी पीठ थपथपा लेती है। लेकिन अंत में न्यायालय में जाकर पुलिस को बेनकाब होना पड़ता है, उससे पुलिस चाहे किसी भी प्रदेश की हो, जनता का पुलिस प्रति विश्वास ही कम होता है। प्रद्युम्न और आरूषि हत्या के मामले इस बात के नवीनतम उदाहरण ही हैं।


-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू। 

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