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एक राष्ट्र, एक चुनाव कब तक...?

Publish Date: November 18 2017 12:38:44pm

कबीरा खड़ा बाजार में, लिए लुकाठी हाथ।
जो घर फूंके आपनौ, चले हमारे साथ।।

कबीरदास जी की तरह 2014 में नरेंद्र मोदी ने बिना किसी लाग-लपेट के कहा था कि जो देश को आगे बढ़ता देखना चाहता है, जिसे अच्छे दिन की जरूरत है, वह हमारे साथ आए। जनता के तथाकथित हिमायती, संसदीय अधिकारों की रक्षा के तथाकथित योद्धा, भ्रष्टाचार के तथाकथित सर्वोपरि दुश्मन के साथ पूरा देश हो लिया, लेकिन आज तीन साल बाद न अच्छे दिन आए, न भ्रष्टाचार कम हुआ। बल्कि मिला तो चुनाव पर चुनाव। 36 माह में 17 विधानसभा चुनाव झेल चुका देश बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार आदि की मार झेल रहा है, लेकिन सरकार या किसी भी राजनीतिक पार्टी को इसकी चिंता नहीं है। 

मई 2014 की 26 मई को जब नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी तो देश को नवजागृति की आस जागी थी। इसी कड़ी में एक राष्ट्र, एक चुनाव भी था, क्योंकि 2014 के आम चुनाव में भाजपा के घोषणा-पत्र में चुनाव सुधार और लोकसभा व राज्य विधानसभा के चुनाव साथ कराने का मुद्दा था। लेकिन एक राष्ट्र, एक चुनाव का मुद्दा गौण ही रहा। हालांकि दिसंबर 2015 में संसद की संबंधित स्थायी समिति ने संयुक्त चुनावों पर अपनी रिपोर्ट पेश की। मार्च 2016 में प्रधानमंत्री ने यह मुद्दा भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में उठाया, लेकिन उसके लिए अभी तक कोई ठोस नीति बनती नहीं दिख रही है।

दरअसल एक राष्ट्र एक चुनाव का मुद्दा केवल सियासी संकल्प बनकर रह गया है।  ज्ञातव्य है कि आजादी के बाद जब चुनावी प्रक्रिया शुरू हुई, तो 1952, 1957, 1962 और 1967 में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराए गए। बाद में राज्य विधानसभाओं के समय से पहले विघटन और लोकसभा की प्रक्रिया के भी बाधित रहने के कारण लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं के चुनाव अलग-अलग कराए जाने लगे। इससे चुनावी व्यवस्था इस कदर बिगड़ी कि अब देश में काम नहीं, चुनाव ही हो रहे हैं। हम अमेरिका, जापान, चीन और रूस की बराबरी करने का दम भर रहे हैं, लेकिन सालभर चुनावों में व्यस्त रहते हैं। चुनावों के दौरान विकास के लिए बड़ी-बड़ी घोषणाएं की जाती हैं, लेकिन धरातल पर कुछ और ही तस्वीर नजर आती है।

संविधान समीक्षा के लिये गठित राष्ट्रीय आयोग (वेंकटचलैया आयोग) की मसौदा समिति के पूर्व अध्यक्ष सुभाष कश्यप एक साथ चुनाव कराए जाने का समर्थन करते हैं। उनका कहना है कि इससे चुनाव पर होने वाला खर्च आधे से भी कम हो जाएगा, लेकिन इसके लिये संविधान के अनुच्छेद 83(2) (लोकसभा का कार्यकाल), अनुच्छेद 85 (संसदीय सत्र को स्थगित करना और खत्म करना), अनुच्छेद 172(1) (विधानसभाओं का कार्यकाल) और अनुच्छेद 174 (विधानसभा सत्र को स्थगित करना और खत्म करना) में संशोधन करना होगा... तथा इससे भी बड़ी चुनौती राजनीतिक दलों में सर्वसम्मति बनाने की होगी। सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एम.एन. वेंकटचलैया की अध्यक्षता वाले इस आयोग ने वर्ष 2002 में सरकार को सौंपी अपनी रिपोर्ट में 230 सिफारिशें की थीं, जिनमें मौलिक अधिकारों के विस्तार और उसमें नए अधिकार तय करने के अतिरिक्त मौलिक कर्तव्यों, चुनाव सुधारों और राजनीतिक दलों के आचरण सहित अनेक मुद्दों पर सिफारिशें शामिल थीं।

सभी राजनीतिक पार्टियां चुनाव एक साथ कराने के पक्ष में हैं। खासकर भाजपा का तो चुनावी मुद्दा ही विधानसभा और लोकसभा के चुनाव एक साथ कराने का रहा है। फिर व्यवधान कहां आ रहे हैं। पहली बात तो यह है कि बार-बार चुनाव के चलते नियमित राजनीतिक रैलियों के कारण सार्वजनिक जीवन प्रभावित होता है। जब भी चुनाव होते हैं, राजनीतिक पार्टियां चंदे जुटाती हैं। अक्सर ये चंदे दान के रूप में व्यावसायिक घराने या समृद्ध लोग देते हैं। यह भ्रष्टाचार की बुनियाद रखता है, क्योंकि जब पार्टियां चुनाव जीतकर सत्ता में आती हैं तो अपने दानदाताओं को उपकृत करने के लिए सरकारी नीतियों को उनके अनुकूल बनाती हैं। दूसरी बात, जब भी चुनाव होते हैं तो नीति निर्माण की प्रक्रिया और सामाजिक माहौल बिगड़ जाता है। बार-बार चुनाव का सामना करने वालीं सरकारें दीर्घकालीन के बजाय अल्पकालीन मुद्दों पर ही ज्यादा ध्यान देती हैं। इससे सुशासन की व्यवस्था गड़बड़ा जाती है। चुनाव अभियान में अनिवार्य रूप से जाति, धर्म, उप-जाति और अन्य विभाजनकारी ताकतें मजबूत होती हैं, जो हमारे राष्ट्रीय ताने-बाने को कमजोर करती हैं। तीसरी बात, चूंकि ऐसे चुनाव देश के कुछ हिस्से या अन्य हिस्सों में बार-बार होते हैं, इसलिए वहां चुनाव आचार संहिता लागू हो जाती है, जो संबंधित राज्य में सरकार के तमाम फैसलों पर प्रतिबंध लगा देती है। इसका असर योजनाओं के क्रियान्वयन एवं सुशासन पर भी पड़ता है। चौथी बात, चुनाव के दौरान भारी संख्या में कर्मचारियों और अद्र्धसैनिक बलों की जरूरत पड़ती है। जब भी इस तरह के चुनाव होते हैं तो अद्र्धसैनिक बलों की तैनाती होती है, जिसके चलते पूर्वोत्तर, जम्मू-कश्मीर और माओवाद प्रभावित जिलों जैसे संवेदनशील क्षेत्र में उनकी पर्याप्त तैनाती नहीं हो पाती। भले ही एक साथ चुनाव कराने के पक्ष में ये तमाम तर्क वजनदार हैं, लेकिन इसके विरोध की आवाजें भी दमदार हैं। उसकी वजह है कुछ संवैधानिक परिवर्तन करने की।

मौजूदा संवैधानिक प्रावधानों को देखते हुए एक साथ चुनावों का आयोजन संभव नहीं है। मार्च से जून, 2019 में निर्धारित लोकसभा चुनाव के साथ राज्यों के चुनाव कराने के लिए संविधान में व्यापक बदलाव, कटौती या विस्तार के लिए संशोधन की आवश्यकता होगी। एक तरफ जहां कुछ राज्यों की विधानसभा के कार्यकाल में 24 महीने की कटौती करनी होगी, वहीं कुछ राज्यों की विधानसभा में दो वर्ष से अधिक की बढ़ोतरी करनी होगी। तमाम आलोचनाओं के बावजूद अगर हम 2019 में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने में सक्षम भी होते हैं तो फिर यह निरर्थक हो जा सकता है, क्योंकि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के समय से पहले विघटन पर कोई प्रतिबंध नहीं है। यह देखना वाकई दिलचस्प है कि 1967 के बाद लोकसभा और विधानसभाओं का समय से पहले विघटन व्यापक पैमाने पर हुआ है। सोलह लोकसभा चुनाव में से छह लोकसभा चुनाव सदन के पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा किए बिना ही किए गए। इसी तरह पिछले सत्तर वर्षों में सौ से अधिक बार संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत आपातकालीन प्रावधान (राज्यों में राष्ट्रपति शासन) का इस्तेमाल किया गया। ऐसे कई मामलों में राज्य विधानसभाओं का समय पूर्व विघटन हुआ।
सभी विधानसभाओं और लोकसभा का चुनाव कराने का सुझाव स्पष्ट रूप से संभव नहीं है, इसलिए हमें एक वैकल्पिक दृष्टिकोण पर नजर डालनी चाहिए। हम इन दोनों निकायों की निर्धारित अवधि को यथासंभव अबाधित कर प्रशासनिक प्रक्रिया के व्यवधानों को कम कर सकते हैं। इन निर्वाचित सदनों के कार्यकाल में स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए प्रावधानों की जरूरत होगी और निर्वाचन आयोग को चुनाव का समय निर्धारित करने के लिए थोड़ी छूट देनी होगी। निम्नलिखित नीतिगत परिवर्तन के बाद इस लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है-

पहला, संविधान में संशोधन करके राज्य विधानसभाओं के कार्यकाल को छह महीने घटाने या बढ़ाने की अनुमति दी जा सकती है। इससे चुनाव आयोग को ज्यादातर चुनाव एक साथ कराने के लिए एक वर्ष का समय मिलेगा। अगर भविष्य में लोकसभा समय पूर्व भंग हो जाती है तो चुनाव आयोग इन शक्तियों का उपयोग करके एक साथ चुनाव कराने के लिए राज्यों के समूह को बढ़ा सकता है। पिछले कुछ सालों से पूरा देश चुनाव प्रचार का ही झंडा उठाए रहता है। चुनाव ही चुनाव। देश में विकास अहम है न कि बार-बार चुनाव के फेर में धन की बर्बादी। देश में 1952 में पहला चुनाव विकास के मुद्दे पर हुआ था। उसके बाद अभी तक जितने चुनाव हुए हैं सभी में विकास ही मुद्दा रहा है।  ऐसे में किसी को समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर यह विकास क्या चीज है, जिसे हमारी सरकारों ने 62 साल में भी पूरा नहीं किया। दरअसल विकास केवल चुनावी शगूफा बनकर रह गया है। 

अगर वास्तव में केंद्र सरकार और राजनीतिक पार्टियां एक राष्ट्र एक चुनाव के लिए संकल्पबद्ध हैं तो यह काम इतना मुश्किल भी नहीं है। पिछले कई सालों से इस बात पर बहस चल रही है कि देश में सालभर चुनाव होते रहते हैं। खासकर राज्यों के चुनाव। क्यों नहीं लोकसभा और राज्यसभा के चुनाव एक साथ होने चाहिए? 

राजेन्द्र अग्रवाल, लेखक 

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