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पद्मावती

Publish Date: November 19 2017 02:14:40pm

राजस्थान के राज्यों के इतिहास का श्रीगणेश मेवाड़ से ही किया जाता है। मेवाड़ के राजाओं की पदवी राणा है और यह अपने को सूर्यवंशी मानते हैं। राजस्थान के छत्तीस राजवंशों में इस वंश को सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। राजस्थान को आठ भागों में बांटा जा सकता है। जैसे मेवाड़ अथवा उदयपुर, मारवाड़ अथवा जोधपुर, तीसरा बीकानेर अथवा किशनगढ़, चौथा कोटा, पाचवां बूंदी, छठा आमेर, सातवां जैसलमेर और आठवां शेष रेगिस्तान।

उपरोक्त आठ भागों में मेवाड़ और जैसलमेर अपनी प्राचीनता के लिए अधिक प्रसिद्ध हंै। मेवाड़ का गौरव आज भी सुरक्षित है। राणा के वंशज अपने आप को भगवान राम के बेटे लव के वंश के साथ जोड़ते हैं। लव ने लोहकट बसाया था जिसे आज लाहौर के नाम से जाना जाता है। लोहकट से चलकर राणा लोग सौराष्ट्र व वहां से मेवाड़ पहुंचे थे। मान्यताओं के अनुसार बल्लभीपुर से मेवाड़ के राजवंश का आरंभ हुआ। छठी शताब्दी में इस पर विदेशियों का आक्रमण हुआ और सौराष्ट्र के बल्लभीपुर से राणा मेवाड़ में आ गये। वर्ष 728 में चितौड़ पर बप्पा का राज था। वर्ष 728 से 1204 तक मेवाड़ के सिंहासन पर कुल मिलाकर 18 राजा बैठे। यह सभी राजा बप्पा रावल के वंशज थे, इनकी कीर्ति आज भी राजस्थान में मौजूद है।

उपरोक्त तथ्यों द्वारा यह दर्शाने का प्रयास किया है कि राजस्थान में मेवाड़ और विशेषतया राणा वंशजों का इतिहास में क्या स्थान रहा है। रानी पद्मावती इसी वंश की बहू थी, कर्नल टाड जेम्स ने 'राजस्थान के इतिहासÓ में लिखा है कि रानी पद्मावती की सौन्दर्य की प्रशंसा सुनकर अलाऊदीन खिलजी ने चितौड़ पर हमला किया था। रानी पद्मिनी को पा लेने के लिए अलाऊदीन ने चितौड़ की घेराबंदी की और शर्त रखी की पद्मावती के पा लेने के बाद बिना युद्ध किए वापस चला जाएगा। जब अलाऊदीन की उपरोक्त शर्त को राणा ने स्वीकार न किया गया तो खिलजी ने कहा मुझे केवल पद्मिनी का चेहरा ही दिखा दिया जाए। उपरोक्त बात का जब रानी पद्मिनी को पता चला तो उसने राणा के पास जाकर शर्त स्वीकार करने को कहा। अलाऊदीन का राजभवन में सत्कार हुआ और पद्मावती का चेहरा देखकर लौट पड़ा। राणा खिलजी के साथ किले के बाहर बातें करते-करते आगे निकल गया तो खिलजी के सिपाहियों ने हमला कर उसे कैद कर लिया।

अलाऊदीन खिलजी ने राजपूत सरदारों को संदेश भेजा कि राणा को छोड़ा जा सकता है बशर्त रानी पद्मिनी समर्पण करे। रानी पद्मावती ने एक योजना तहत अलाऊदीन खिलजी को संदेश भेजा कि चितौड़ की घेराबंदी जब समाप्त कर दी जाएगी तो वह अपनी राजपूत सहेलियों के साथ खिलजी पास आ जाएगी। तय समय पर चितौड़ से सात सौ पालकियां निकलीं और खिलजी के डेरे के पास पहुंच गईं। राणा को पद्मावती से मिलने का समय दिया गया और उसी दौरान राणा व पद्मावती चितौड़ की ओर रवाना हो गए। खिलजी को जब इस बात का पता चला तो उसने उन्हें पकडऩे का आदेश दिया तभी पालकियों में आये राणा के सैनिक बाहर निकल आए और युद्ध शुरू हो गया। राजपूत राणा और पद्मावती को चितौड़ लाने में सफल रहे और खिलजी निराश हो वापस दिल्ली लौट गया और कुछ वर्षों बाद उसने एक बड़ी सेना के साथ चितौड़ की घेराबंदी की और इसी लड़ाई में राणा और उसके सिपाही लड़ते-लड़ते शहीद हुए। जब अलाऊदीन किले भीतर गया तो उसे पता चला अपनी इज्जत व मेवाड़ के मान के लिए पद्मावती अन्य हजारों राजपूत औरतों के साथ अग्नि में कूद कर जान दे चुकी है।

12वीं सदी से लेकर 17वीं सदी तक मुगल राजाओं के हमलों के परिणामस्वरूप भारत का इतिहास, संस्कृति, परम्पराएं सभी प्रभावित हुईं। लेकिन आजादी के बाद भी हमने अपने इतिहास को संभालने का प्रयास नहीं किया। यही कारण है कि केवल धन कमाने के उद्देश्य से भारतीय इतिहास व संस्कृति से छेड़छाड़ होती चली गई। देश की संस्कृति व इतिहास से जुड़ी लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ होता चला गया। आधुनिकता के नाम, धर्म निरपेक्षता की आड़ में और प्रगतिवाद का सहारा लेकर जो भी किया गया वह देश के बहुमत हिन्दू समाज के धर्म व संस्कृति से खिलवाड़ ही किया गया। जिन प्रतीकों को देश की पहचान के साथ जोड़ा जाना चाहिए था उनकी अनदेखी की गई और उन प्रतीकों को उभारा गया जिससे देश के अतीत का वह भाग सामने आता है जिस पर आज मान नहीं किया जा सकता।

फिल्म जगत में ही नहीं साहित्य, इतिहास तथा धर्म क्षेत्र में भी एक योजनाबद्ध तरीके से देश के स्वाभिमान को चोट पहुंचाने के प्रयास आज तक जारी हैं। फिल्म पद्मावती को लेकर भी यही आशंका है कि इसमें खलनायक अलाऊदीन खिलजी को नायक की तरह पेश कर मेवाड़ की शान व मान से खिलवाड़ करने की कोशिश है। भारत सरकार तथा फिल्म सेंसर बोर्ड को मेवाड़ परिवार के सदस्यों को साथ ले फिल्म पद्मावती में जो भी आपत्तिजनक दृश्य हों उन्हें हटा देना चाहिए ताकि राजपूत समाज की भावनाओं को ठेस न लगे। भविष्य में हिन्दू भावनाओं से खिलवाड़ न हो यह बात भी सुनिश्चित की जानी चाहिए। 


- इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।

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