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अस्पताल का लक्ष्य

Publish Date: November 25 2017 01:06:52pm

लाला हरदयाल ने अपनी पुस्तक 'व्यक्तित्व-विकास संघर्ष और सफलता' में धन कमाना जिन स्त्री और पुरुष का मुख्य लक्ष्य रह गया है उनको लक्ष्य रख कुछ इस प्रकार लिखा है 'बहुत से स्त्री-पुरुष इतने धनलिप्त होते हैं कि वे कोई भी ऐसा काम गंभीरता से हाथ में नहीं लेते, जिससे धन की प्राप्ति न हो। उनका यह विश्वास है कि अध्ययन तथा मानसिक परिश्रम के लिए अपने आपको कष्ट देना मूर्खता है, क्योंकि केवल पैसा कमाने के लिए कड़ा परिश्रम, तत्पश्चात् खूब खेल तथा भरपूर मनोरंजन-यही उनके जीवन का मुख्य लक्ष्य है। ऐसे लोग बुद्धि को केवल भौतिक संपन्नता की चाबी मात्र समझते हैं तथा व्यक्तिगत विकास को एक मूर्खतापूर्ण मानसिक सनक। यह शोचनीय पदार्थवादी प्रवृत्ति समाज के सभी वर्गों में अत्यन्त गहरी जड़ जमाए हुए है। क्या धनी, क्या निर्धन सब इससे कष्ट पाते हैं। एक बूढ़ी कामकाजी महिला ने मुझसे अपने बेटे की शिकायत करते हुए कहा, 'उसे प्राय: सस्ती पुस्तकें खरीदने की आदत है। वह पुस्तकों पर अपना पैसा बर्बाद करता है। भला उनसे उसे क्या लाभ होगा? वह तो एक बढ़ई है न कि एक अध्यापक।' हम कितने ही ऐसे लोगों से मिलते हैं जिनका जीवन अपने रोजगार तथा उथले मनोरंजन की नीरस खींचतान में व्यतीत होता है। वे भले ही अपने व्यवसाय अथवा धंधे में कितने ही कुशल तथा ख्यातिप्राप्त क्यों न हों-चाहे वह कानून हो, धर्म हो, चिकित्सा हो अथवा अन्य कोई कौशल हो, परन्तु जब भी उन्हें आजीविकोपार्जन संबंधी अध्ययन से फुर्सत मिलती है वे केवल गोल्फ, शतरंज, पर्वतारोहण में ही अपना समय व्यतीत करते हैं। ऐसे एकांगी अतिभौतिकवादी लोगों से मैं यही कहूंगा, ध्यान रखिए कि कहीं छाया ही आपके हाथ में न रह जाये तथा सारवस्तु निकल जाये। यह माना कि आप अपनी बुद्धि का प्रयोग पैसा कमाने में कर सकते हैं किन्तु इस प्रकार आप प्रकृति की इस अमूल्य देन का निरादर एवं दुरुपयोग कर रहे होते हैं। मुख्यत: बुद्धि का प्रयोग विकास तथा समाज-सेवा के कार्यों में करना चाहिए। इसे अपने ही सह-नागरिकों के शोषण का अस्त्र मत बनाइए। यदि आप अपने मस्तिष्क को धनोपार्जन करने वाली एक मशीन बना लेते हैं तो आपमें तथा एक पतित एवं दयनीय वेश्या की स्थिति में कोई अंतर नहीं। इस प्रकार की वेश्यावृत्ति हमारी पूंजीवादी व्यवस्था में इतनी छाई हुई है कि आप इसे स्वाभाविक समझने लगे हैं। न तो आप इस स्थिति से घृणा करते हैं और न ही इस पर आपको कोई आश्चर्य होता है।'
लाला हरदयाल ने जो बात वर्षों पहले कही वह आज भी सार्थक है। वर्तमान दौर में भौतिक सुख-सुविधा और धन कमाना ही इंसान का लक्ष्य रह गया है। इस बात का एहसास गुडग़ांव के फोर्टिस अस्पताल द्वारा 7 वर्षीय लड़की जिसकी डेंगू के कारण मौत हो गई थी उसके इलाज को लेकर जो बिल जारी किया गया है उसको देख तो यही कहा जा सकता है कि अब अधिकतर निजी अस्पतालों का लक्ष्य रोगी का इलाज करना न होकर केवल धन कमाना ही हो गया है। भगवान के बाद अगर संसार में कोई मौत की सजा दे सकता है तो वह एक न्यायाधीश दे सकता है और रोगी को कोई मौत से बचा सकता है तो वह डाक्टर ही है। डाक्टर तो जब पढ़ाई समाप्त करता है तो शपथ लेता है कि रोगी की सेवा ही उसका मुख्य लक्ष्य होगा लेकिन फोर्टिस अस्पताल का बिल देखकर एहसास होता है कि लक्ष्य सेवा नहीं अब धन कमाना ही प्राथमिकता हो गई है। अस्पताल द्वारा जो बिल दिया गया है वह इस प्रकार है • दाखिला खर्च 1, 250 • ब्लड बैंक बिल 61,315 • डायगनॉस्टिक 29, 290 • डाक्टरी खर्च 53,900 • दवाईयों का बिल 3,96,732.48 • इक्विपमैंट चार्ज 71,000 • इनवैस्टीगेशंस 2,17,594 • मेडिकल, सर्जिकल प्रोसीजर्स 2,85,797 • मेडिकल कंज्यूमेबर्स 2,73,394 • अन्य खर्च 15,150 • कमरे का किराया 1,74,000 • डिस्काऊंट 20,000 कुल मिलाकर 15,59,422.48 रुपए।
अस्पताल ने अपने बिल को उचित दिखाने हेतु 15 दिन के इलाज के दौरान 660 टीके लगाने वाली सुइया और 2700 दस्तानों के इस्तेमाल का दावा किया है। उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि निजी अस्पताल चाहे वह नामी अस्पताल हो या छोटे उनमें कुछ एक को छोड़कर शेष मरीज को कमाई का साधन ही समझते हैं।
स्वास्थ्य और शिक्षा दोनों बुनियादी सेवाएं हैं, इन सेवा क्षेत्रों में निजी हस्तक्षेप तभी बढ़ा है जब सरकार उपरोक्त सेवाएं उपलब्ध कराने में असफल रही। सरकार की असफलता का खामियाजा आज जन साधारण भुगत रहा है। सरकार अगर आज भी जनता प्रति अपनी जिम्मेवारी को समझते हुए स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्र में ठोस कदम नहीं उठाती तो भविष्य में अमीर और गरीब दोनों निजी क्षेत्र में चल रहे अस्पतालों और स्कूलों पर ही निर्भर हो जाएंगे और फिर धन कमाने की हवस पर तब काबू पाना भी मुश्किल हो जाएगा। सरकार को तत्काल उपरोक्त मामले में छानबीन करा सत्य को सार्वजनिक करना चाहिए।    


इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।

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