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नोटबंदी से सरकार में विश्वास बढ़ा

Publish Date: November 25 2017 01:10:37pm

अचानक 8 नवम्बर 2016 की शाम 8 बजे भारत सरकार के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 500 व 1000/- के बड़े नोटों को चलन से बाहर करने की घोषणा कर दी जिस कारण लोगों ने दिये गये समय में उनके पास जमा 500 व 1000/- के नोट बैंक में अपने अपने खाते में जमा करवा दिये। इस घोषणा के एक साल बाद विपक्षी राजनीतिक दलों का यह कहना है कि चूंकि 99.89 प्रतिशत नोट बैंकों में वापस जमा हो गये तथा मात्र 0.11 प्रतिशत नोट ही वापस नहीं आ पाये तो सरकार का नोटबंदी का यह कदम एकदम से असफल रहा है और 500 व 2000/- के नोट छापने पर 8000 करोड़ रुपये और खर्च हो गये जिससे कोषागार पर अत्यधिक भार पडा है। अब बाकी बचे पुराने नोट। विदेशों में रहने वाले अथवा स्वदेश में कुछ लोगों के द्वारा जाने अनजाने में छिपाये गये पुराने नोट ही उनके पास रह गये है जो अब रद्दी बन चुके है। नोटबंदी के कारण ही 57 लाख नये आयकर दाता बने हैं तथा कैशलेस लेनदेन में भारी बढ़ोत्तरी हुई है। समाज में बैंक का महत्त्व बढ़ा है तथा नेट-बैंकिंग व भीम-ऐप व अन्य ऐप भुगतान के प्रमुख साधन बन गये है। 
अब व्यक्ति के सभी लेनदेन बैंकों के माध्यम से सरकार की निगरानी में आने लगे है।  नोटबंदी में सबसे दुखद स्थिति यह रही कि देश में सबसे अधिक ईमानदार छवि रखने वाले बैंक-कर्मियों ने जिस प्रकार सरकार की इस योजना को फेल करते हुए कमीशन लेकर घर घर से भारी मात्र में नोट लाकर उनको नये नोटों में परिवर्तन किया तथा गरीब व मध्यम वर्ग के लोगों को बैंकों के दरवाजे पर भारी संख्या में एकत्र करवा दिया जिसमें बीमार, अपाहिज व महिलायें भारी संख्या परेशान हुई। नोटबंदी के कारण ही सरकार 2.24 लाख फर्जी कम्पनियां पकड सकी है जिन्हें बंद किया जा रहा है व उनके संचालकों के विरुद्ध कार्यवाही की जा रही है। भ्रष्ट लोगों की चेन ने देश भर के भ्रष्टों के नोट ठिकाने लगाये। विपक्षी राजनीतिक दलों के द्वारा सरकार के उठाये गये इस ऐतिहासिक कदम की सराहना करने के स्थान पर उसका विरोध करते हुए राजनीतिक लाभ लेना चाहते हैं। आर्थिक सुधार के मामलों में की गई राजनीति से देश का विकास व्यापक रुप में बाधित होता है। जिस प्रकार गांव गांव में जाकर शहर के लोगों के द्वारा ग्रामीण रिश्तेदारों, जान पहचान वालों अथवा कमीशन खोरों के खातों में रुपया जमा करवाया और फिर उन्होंने उन खातादारों को बार बार रुपया बैंक से निकालने के लिए बाध्य किया।
सरकार वोटों की राजनीति से ऊपर उठी है तथा आर्थिक विकास ही मात्र कारगर मुददा हो गया है। नोटबंदी के बाद कई राजनैतिक दलों ने बेहिसाब धन बैकों में जमा किया। नोटबंदी के इस फैसले से यह तो साबित हो ही गया कि देश में राजनैतिक दलों के संरक्षण में ही भ्रष्टाचार फल फूल रहा है। भ्रष्टाचार के उन्मूलन के लिए नोटबंदी के दौरान देश की जनता के द्वारा दिखाई गई एकमतता सराहनीय है जिसको विश्व बैंक व अन्य ने भी मूल्यांकित किया है। 
डा. सूर्य प्रकाश अग्रवाल, लेखक 

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