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मस्जिद पर आतंकी हमला

Publish Date: November 26 2017 01:26:56pm

मिस्र के उत्तर सिनाई क्षेत्र में जुम्मे की नमाज के दौरान हुए आतंकी हमले में अब तक 235 लोगों के मरने व 130 से अधिक जख्मी लोगों का समाचार आया है। प्राप्त समाचार अनुसार अल आदिश शहर की अल सैदा मस्जिद के पास बम रखा गया था। बम धमाके के बाद जब नमाज छोड़ लोग बाहर भागे तो बाहर सड़क किनारे खड़ी चार गाडिय़ों में बैठे हमलावरों ने गोलियां चलानी शुरू कर दी। मस्जिद में अधिकतर सूफी में विश्वास करने वाले लोग ही आते हैं। सूफियों को कट्टरपंथी अपना विरोधी ही मानते हैं। मस्जिद से पहले मिस्र में ईसाई गिरजाघरों पर भी आतंकी हमले हुए हैं।

इस्लाम के नाम पर आतंकी खेल खेलने वाले लोग सारी दुनिया को इस्लाम के घेरे में लाना चाहते हैं। अपने उपरोक्त लक्ष्य की प्राप्ति हेतु वह खूनी खेल खेलते चले जा रहे हैं। विश्व भर में इस्लाम के नाम पर जेहाद करने वालों का आधार भी इस्लाम में ही छिपा है।

इस्लाम विश्व को तीन क्षेत्रों में बाँटता है, दारूल इस्लाम, दारूल हरब और दारूल अमन।
1. दारूल इस्लाम : वह अंचल है, जहां केवल मुसलमान रहते हैं और जहां एकमात्र धर्म इस्लाम है। इस अंचल में गैर-मुस्लिम अनुमति के बिना प्रवेश भी नहीं कर सकता, न ही वह स्थायी रूप से रह सकता है और न ही संपत्ति खरीद सकता है। उसे वहां अपने धार्मिक रीति-परम्परा के पालन की स्वतंत्रता नहीं होती है।

2. दारूल अमन :  उस अंचल को कहते हैं जहां लोग मुस्लिम शासकों की अधीनता स्वीकार कर उन्हें जजिया कर देते हैं। इस अंचल के लोगों को और तो सारी स्वतंत्रता है पर वे इस्लाम की आलोचना नहीं कर सकते और न ही कुरान, हदीस तथा अन्य पुस्तकों पर टीका-टिप्पणी कर सकते हैं।

3. दारूल हरब : वह क्षेत्र है जहां लोगों ने न तो इस्लाम स्वीकार किया और न ही उसकी अधीनता। जब तक दारूल हरब का क्षेत्र दारूल इस्लाम अथवा दारूल अमन नहीं बन जाता अर्थात् वहां मुस्लिम शासन और इस्लामिक कानून लागू नहीं हो जाते तब तक उसे विधर्मी क्षेत्र माना जाता है। प्रत्येक मुस्लिम का यह धार्मिक कर्तव्य है कि वह विधर्मी क्षेत्र में इस्लाम की अधिसत्ता स्थापित करने के लिए निरंतर प्रयत्न करता रहे। उसे अपने इस प्रयत्न में हिंसा का सहारा भी लेना पड़े तो भी धर्मोचित्त ही माना जायेगा।

काफिर : सैयद शरीफ जुरजानी कहते हैं - 'मानव जाति दो भागों में विभक्त है। एक भाग उन लोगों का है जो मोहम्मद के धर्मोपदेशों पर विश्वास रखते हैं। दूसरे वे लोग हैं जो इन पर विश्वास नहीं रखते। कुरान की विभिन्न आयतों में मोहम्मद पर विश्वास न रखने वालों को काफिर की संज्ञा दी गई है और उन्हें इस जन्म में मौत और कयामत के पश्चान दोजख की स•ाा देने का प्रावधान किया गया है। रद्दू अल मुख्तार (खण्ड-3, पृष्ठ 422) के अनुसार काफिरों को पांच श्रेणियों में बांटा गया है।

1. जो कुरान और पैगम्बर में विश्वास नहीं रखते।
2. जो खुदा पर ही विश्वास नहीं रखते।
3. जो एक खुदा पर तो विश्वास रखते हैं लेकिन उसके आगमन पर विश्वास नहीं रखते।
4. जो हजरत मोहम्मद द्वारा दिये गये उपदेशों को धर्मोपदेश न मानकर मिथ्या मानते हैं।
5. जो इस्लाम की धारण को ही विचारहीनता समझते हैं।

खुदा का रहम?
यूं तो कुरान का हर परिच्छेद - सुर: वाक्य से प्रारंभ होता है - बिस्मिल्लाहिर्रहमाननिर्रहीम अर्थात् खुद बड़ा मेहरबान है, निहायत रहम करने वाला है पर कुरान मजीद में खुदा के रहम की बानगी भी दृष्टव्य है, कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं -
1. 'ए, नबी, मुसलमानों को जेहाद पर उभारो। तुममें बीस आदमी साबित कदम रखने वाले होंगे, तो दो सौ काफिरों पर गालिब रहेंगे और अगर सौ ऐसे होंगे तो हजार पर गालिब रहेंगे, इसलिए कि काफिर ऐसे लोग हैं जो कुछ भी समझ नहीं रखते। - सुर : तुल-अम्फाल (65)
2. 'जो लोग अहले किताब में से खुदा पर ईमान नहीं लाते और न अखिरत के दिन पर यकीन करते हैं और न उन वस्तुओं को हराम मानते हैं जो खुदा और उसके रसूल ने हराम की हैं और न दीने-हक को कुबूल करते हैं, उनसे जंग करो। यहां तक कि जलील होकर अपने हाथ से जजिया दें। -सुर : तौबा (28)
3. 'ऐ पैगम्बर, काफिरों और मुनाफिकों से लड़ो और उन पर सख्ती करो और उनका ठिकाना दोजख है और बुरी जगह है। - (सुर, तौबा 72)
4. 'और उन लोगों से लड़ते रहो, यहां तक कि फित्ना (अर्थात् कुफ्र का फसाद) बाकी न रहे और ददन सब खुदा का ही हो जाये और अगर बाज आ जाये तो खुदा उनके कामों को देख रहा है। - सूर : अम्फाल (39)
केवल युद्ध करके काफिरों को बंदी बना लेना ही यथेष्ट नहीं है। कुरान और खुदा इस विषय में बंदियों को कत्ल करने का स्पष्ट आदेश देते हैं।
5. 'पैगम्बर को मुनासिब नहीं कि उसके कब्जे में कैदी रहें। जब तक काफिरों को कत्ल करके जमीन में कसरत से खून न बहा दे। तुम लोग दुनिया के माल के तालिब हो और खुदा अखिरत की भलाई चाहता है और खुदा गालिब हिकमत वाला है। -सूर : तुल-अम्फाल (67)

मुस्लिम समाज के भीतर चल रहे शिया और सुन्नी के संघर्ष के कारण भी आज विश्व में हिंसा हो रही है। उपरोक्त कारणों के साथ-साथ इस्लामिक देशों की राजनीतिक, आर्थिक व सामाजिक परिस्थितियां भी आतंकवाद का कारण कही जा सकती है। इस्लाम के नाम पर हो रही आतंकी घटनाओं को तभी रोका जा सकेगा जब इस्लाम में विश्वास रखने वाले स्वयं इस्लाम के नाम पर हो  रही हिंसा व अत्याचार का विरोध करेंगे।

विश्व कभी भी एक धर्म के आकाश के नीचे नहीं आ सकता क्योंकि उपरोक्त बात ही प्रकृति के विरुद्ध है। प्रकृति के अनेक रंग है और हर रंग का अपना महत्व है समय, परिस्थितियों और वातावरण के साथ मिलकर ही प्रकृति अपने रंग को प्रकट करती है। विश्व भर में प्रकृति के अनेक रंगों के कारण ही जीव जन्तु से लेकर जड़ पदार्थों के अपने-अपने गुण और रंग है। प्रकृति की इस विभिन्नता को कोई भी समाप्त नहीं कर सकता। इस्लाम में विश्वास रखने वाले इस्लाम के नाम पर जेहाद करने वाले दोनों को यह सैद्धांतिक बात समझनी होगी। इस्लाम के भीतर ही कई प्रकार के वर्ग है अगर वह समाप्त नहीं हुए तो अन्य धर्मों को कैसे समाप्त किया जा सकता है।

सत्य एक ही है। और उस तक पहुंचने के रास्ते अनेक हो सकते हैं। उपरोक्त बुनियादी बात को युगों पहले हिन्दू समाज ने समझ लिया था। इसलिए उसने धर्म के नाम पर तलवार नहीं उठाई। विचार की लड़ाई विचार से ही लड़ी। इस्लाम में विश्वास करने वाले भी अगर प्रकृति के नियम को स्वीकार कर जीना सीख लेंगे तो वह सुखी हो जाएंगे हिंसा फैलाने से कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है। आतंक की राह पर चलने वालों का हर स्तर पर विरोध ही होना चाहिए क्योंकि जो कुछ आतंक में विश्वास करने वाले कर रहे हैं वह अमानवीय है और अंत में उनके लिए आत्मघाती ही साबित होगा।
    

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