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क्या इतिहास का सत्यान्वेषण-इतिहास का भगवाकरण

Publish Date: November 27 2017 12:50:16pm

यह देश जितना विविधताओं का देश है उतना ही विडम्बनाओं का भी देश है। इस देश में अभिव्यक्ति की आजादी, प्रजातंत्र और संविधान के नाम पर सब अपना मौलिक अधिकार तो मांगते हैं किन्तु अपने विरोधी विशेषकर हिंदुत्ववादी किसी दल या उसके उपांग के किसी व्यक्ति के इस अधिकार का प्रयोग अंशमात्र कर लेने के प्रयास में भी उन्हें आपत्ति और अपने 'सर्वाधिकार सुरक्षित' अधिकारों का हनन लगने लगता है और ये 'धर्मनिरपेक्षता' के नाम का सहारा लेकर सारे 'मुस्लिम वोटों' की 'राष्ट्र हितों को भी बलि चढ़ा कर वांछना रखने वाले' लोग 'बीजेपी से अधिक राष्ट्रभक्त' दलों को इकट्ठा कर 'भगवाकरण-भगवाकरण' का शोर उसी अंदाज में मचाना शुरू कर देते हैं जिस अंदाज में पंचतन्त्र की कहानियों में 'भेडिय़ा आया-भेडिय़ा आया' का शोर मचाया जाता रहा होगा। 
पिछली बीजेपी नीत एनडीए सरकार के समय भी अपने 'राष्ट्र-प्रेम' के लिए जे एन यू के माडल के लिए विख्यात वामपंथी और उनकी विचारधाराओं के पोषक इतिहासकार तत्कालीन सरकार की किसी भी पहल को 'भगवाकरण' की दुहाई देकर पंचतन्त्र की कहानी दुहराते रहे हैं किन्तु अब इन धर्मनिरपेक्ष पाखंडियों की असलियत जनता के सामने आ चुकी है कि ये कितने 'राष्ट्र भक्त' हैं और कितने 'कुशल प्रशासक' हैं।
वर्तमान 'ताज विवाद' बीजेपी विधायक संगीत सोम के एक भाषण में दिए गये उद्धरण से प्रारम्भ हुआ और वाया प्रधानमंत्री मोदी होता हुआ उप्र के मुख्यमंत्री जोगी के आगरा ताजमहल की यात्रा के बाद जनसभा में दिए भाषण के उद्धरण के बाद समाप्त हो जाना चाहिए था किन्तु ये धर्मनिरपेक्ष कांग्रेसी, सपाई, बसपाई और वामपंथी दल इस मुद्दे को मुस्लिम वोटों के अपने-अपने पक्ष में ध्रुवीकरण के लिए इस चुभते मुद्दे को कैसे कैश न करें, यह तो सोचा भी नहीं जा सकता। उन्हें तो राष्ट्र, सत्यता और राष्ट्रधर्म से अधिक अपनी सत्ता का आकर्षण विचलित करता रहा है। वे जानते हैं कि मुहम्मद साहब का कार्टून सुदूर विदेश में बनाए जाने पर भी भारत का मुसलमान उद्वेलित हो जाता है तो ताज जैसे मुद्दे पर उसे बड़ी आसानी से क्रोधित किया जा सकता है और हिन्दुओं के विरोध के चलते अपने दल के पक्ष में एकत्रीकरण किया जा सकता है। 
सही मायने में मोदी की धर्म निरपेक्ष सरकार जो हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई और अन्य बहुत छोटे-छोटे धर्मों के भी हितों और अस्तित्व का ध्यान रख रही है, इन धर्मनिरपेक्षियों को पच ही नहीं रही है। उन्हें तो देश में अपने अधीन भ्रष्टाचार की खुली छूट के साथ हिन्दू धर्म, भारतीयता और भारतीय संस्कृति को दिन में पच्चीस बार गाली देकर निकृष्टतम संस्कृति सिद्ध करने की चेष्टा करने वाले नेता और संविधान की दुहाई देकर अल्पसंख्यकों का देश के संसाधनों पर पहला हक बताने वाले देश के सर्वोच्च प्रशासक चाहिए। उन्हें सबके विकास की चिंता वाला प्रधानमन्त्री और मुख्य मंत्री कैसे सहन हो सकता है? इसके लिए वे हर दर्जे के निम्न आरोप भी लगाने से नहीं चूक रहे हैं। 
विगत सत्तर वर्षों से चली आ रही देश में कोढ़ जैसी समस्याओं के जब प्राथमिक इलाज का प्रयास इन भाजपानीत सरकारों द्वारा किया जा रहा है तो वे इसे राष्ट्रहित में उठाए गये प्रशंसनीय पगों के रूप में न लेकर, इन्हें अपने अस्तित्व पर किये जा रहे कुठाराघात के रूप में ले कर, इन क्रांतिकारी पगों में कमियाँ निकाल कर सामूहिक 'अरण्य-रोदन' में लगे हैं। मोदी और प्रांतीय सरकारों के मुखियाओं पर अनर्गल दोष मढ़ कर हर मामले में मोदी की संदिग्ध भूमिका की लिप्तता का रोना रोकर वे समझते हैं कि वे मोदी के प्रति लोगों के, विशेषकर बहुसंख्यक समाज के कुछ वर्गों में घृणा पैदा कर सकेंगे किन्तु हो उलटा रहा है। प्रतिक्रिया में बहुसंख्यक समाज का हरेक वर्ग जो अपने अपने वर्ग के तानाशाह नेताओं से त्रस्त था, बीजेपी के पक्ष में लामबंद हो रहा है। इस में केवल इन तथाकथित धर्मनिरपेक्ष नेताओं का ही हाथ है, यह भी पूर्ण सत्य नहीं है। इसमें मोदी और भाजपानीत सरकारों के मुखियाओं की 'सबका विकासÓ नीति पर निरपेक्ष भाव से चलने का भी बहुत बड़ा हाथ है।
और अब फिर से मुद्दे पर। ताज पर विवाद उसके इतिहास को लेकर उठाया गया है। सन 1971 में मैंने एक महाराष्ट्रियन इतिहासकार पी एन ओक की एक पुस्तक पढ़ी थी, 'भारतीय इतिहास की भयंकर भूलेंÓ। इस किताब को पढ़ कर मेरा दिमाग हिल गया था। इस पुस्तक में ताजमहल के बारे में भी लिखा गया था जिसे पढ़ कर मैं आगरा गया और ताजमहल और फतेहपुर सिकरी दोनों को देखने गया। यहाँ मैं यह बता देना उचित समझता हूँ कि मैं बहुत व्यावहारिक व्यक्ति हूँ। इतिहास में मेरी रूचि रही है और इसी के चलते मेरे कई ऐतिहासिक आलेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छप चुके हैं। मैं बिना प्रमाण किसी की भी किसी बात को नहीं मानता। पीएन ओक ने अपनी उस पुस्तक में जो प्रश्न उठाए और प्रमाण प्रस्तुत किये, वे बड़े सटीक और गम्भीर थे। पुष्टि के लिए जब मैं आगरा और फतेहपुर सीकरी गया तो मुझे लगा कि ओक साहब की बातों में दम है और एक बारगी उनके तथ्यों की जांच एक विशेषज्ञ समिति के माध्यम से जरुर होनी चाहिए।
जहां तक इतिहास का प्रश्न है। लगभग हर इतिहासकार (अंग्रेजों सहित) ने उपलब्ध भारतीय इतिहास के मध्यकालीन इतिहास को (वामपंथी इतिहासकारों को छोड़कर) विशेषरूप से मुगलकालीन मध्यकालीन इतिहास को झूठ का पुलंदा कहा है। इतिहास सच्चा हो भी नहीं सकता जब तक उसे एकदम निरपेक्ष भाव से न लिखा जाय। यह भी विडम्बना है कि इतिहास को अगर कुछ काल बाद लिखा जाए तो उसके लिए अनुमान लगाने पड़ते हैं जो सही ही होंगे, इसकी कोई गारंटी नहीं होती। समकालीन इतिहास के लेखक यदि तत्कालीन राजा या मुख्य प्रशासक के समर्थक हैं तो वे राजा को महिमामंडित करेंगे और अगर विपक्षी हुए तो उसको और उसके कार्यकलापों को घृणास्पद बनाने से नहीं चूकेंगे। दोनों परिस्थितियों में इतिहास सत्य इतिहास नहीं होगा और अगर इतिहास किसी दरबारी या नौकर द्वारा लिखा जाए तो फिर बात ही क्या है ? 
इस विषय में यह भी उल्लेखनीय है कि सभी मुगलों के इतिहास लेखक उनके दरबारी और वेतन पाने वाले कर्मचारी थे। भला उनकी कैसे हिम्मत हो सकती थी कि वे किसी मुगल बादशाह की शान में कोई गुस्ताखी करें। इन लेखकों का लेखन कैसा था इसका सबसे सटीक उदाहरण दिया जाए तो दिल्ली के महाराजा विक्रमादित्य की उपाधि धारण करने वाले महाराज हेमचन्द्र का दिया जा सकता हैं जिन्हें मुगल इतिहास में हेमू बनिया कहा गया है। 
दूसरा उदाहरण हिन्दू हृदय सम्राट महाराज शिवाजी का दिया जा सकता है जिन्हें मुगल इतिहास में पहाड़ी चूहा के उपनाम से अनेक बार सम्बोधित किया गया है। यही दशा महाराणा प्रताप के भी सम्बोधन में हुई थी। वर्तमान काल की बात करें तो अधिक दूर नहीं केवल 1975-76 तक ही लौटें तो इमरजेंसी में इंदिरा गांधी द्वारा गढ़वाए गये टाइम कैप्सूल को जब जनता सरकार ने निकलवाया तो उसमें अर्वंाचीन इतिहास के अनेक प्रमुख प्रसंग गायब थे और प्रमुखता से नेहरु-गाँधी खानदान का महिमामण्डन ही था।
अब वक्त आ गया है कि तुरंत निरपेक्ष इतिहासकारों की एक विशेष समिति बनाई जाय जो उपलब्ध साक्ष्यों, वैज्ञानिक जांचों और इन्ही इमारतों की तलहटियों में दबे पड़े साक्ष्यों को सामने लाकर जनता के सम्मुख प्रस्तुत करे और इतिहास का साक्ष्यों के आधार पर पुनर्लेखन किया जाना सम्भव हो सके। यदि सरकार अपनी ओर से कोई पहल करने को राजी न हो तो कुछ संगठनों को माननीय न्यायालय में वाद दायर कर सरकार को इस विषय में निर्देश/जनादेश दिलाना चाहिए कि वह निश्चित रूप से यह कार्य करें ताकि जल्दी ही वह एक विशेषज्ञ समिति बना कर वास्तविकता जनता के सामने रखें।                   

राज सक्सेना, लेखक। 
 

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