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कर्जे में फंसी कंपनियां

Publish Date: November 27 2017 01:00:45pm

सरकार ने दिवाला कानून में संशोधन करते हुए पिछले दिनों एक अध्यादेश जारी किया है। जिसमें जानबूझकर कर्ज नहीं लौटाने वाले और जिनके खातों को फंसे कर्ज (एनपीए) की श्रेणी में डाला गया है, उन्हें ऐसी संपत्तियों की नीलामी में बोली लगाने से रोकने का प्रावधान किया गया है। कारपोरेट कार्य मंत्रालय ने एक बयान में कहा है कि अध्यादेश लाने का मकसद गलत इरादा रखने वाले लोगों को ऋण शोधन व दिवाला संहिता (आइबीसी) के प्रावधानों का उल्लंघन करने से रोकने के लिए एहतियाती उपाय करना है। कानून में किया गया ताजा संशोधन उन मामलों में भी लागू होगा जहां शोधन प्रक्रिया समाधान को अभी मंजूरी मिलना बाकी है। ऋण शोधन कानून में किए इस संशोधन को बाद में संसद की मंजूरी की आवश्यकता है। संसद का शीतकालीन सत्र 15 दिसंबर से शुरू होने की संभावना है। इन बदलावों का मतलब यह है कि बैंकों के कर्ज की वसूली के लिए ऋण शोधन कार्रवाई के तहत आई संपत्तियों की नीलामी में उनके प्रवर्तकों को बोली लगाने की अनुमति नहीं होगी। रिजर्व बैंक ने इस कानून के तहत पहले चरण में 5,000 करोड़ से अधिक के बकाया वाली 12 कंपनियों के मामले को समाधान के लिए भेजा।

ऐसी आशंका थी कि कर्ज नहीं लौटाने वाले प्रवर्तक ऋण शोधन कार्रवाई के अंतर्गत आने वाली कंपनी को कर्ज वसूली के लिए नीलामी में फिर से अपने नियंत्रण में ले सकती हैं। इसे देखते हुए सरकार ने कानून में संशोधन को लेकर अध्यादेश लाने का फैसला किया। मंत्रालय अनुसार राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने अध्यादेश को मंजूरी दे दी है। इसमें कहा गया है कि संशोधनों का उद्देश्य उन लोगों को इसके दायरे से बाहर रखना है जिन्होंने जानबूझकर कर्ज नहीं लौटाया और फंसे कर्ज (एनपीए) से संबंधित हैं और जिन्हें नियमों का अनुपालन न करने की आदत है। इसीलिए उन्हें किसी कंपनी के दिवाला संबंधी विवाद के सफल समाधान में बाधक माना गया है। अध्यादेश के तहत वे सभी लोग बोली नहीं लगा सकेंगे जिनके खातों में एक साल या उससे अधिक समय से गैर-निष्पादित परिसंपति के रूप में वर्गीकृत किया गया और वे समाधान योजना लाए जाने से पहले ब्याज समेत बकाया राशि का निपटान नहीं कर पाए। इसके अंतर्गत आईबीसी के तहत जिन कंपनियों के खिलाफ ऋण शोधन या परिसमापन प्रक्रिया चल रही है, उससे संबद्ध कंपनियां, प्रवर्तक, होल्डिंग कंपनियां, अनुषंगी इकाइयां और संबद्ध कंपनियों या संबंधित पक्ष फंसी संपत्ति के लिए बोली लगाने के लिए पात्र नहीं होंगे। संशोधित संहिता यह भी कहती है कि ऋणदाताओं की समिति (सीओसी) को समाधान योजना की मंजूरी से पहले उसकी व्यवहार्यता सुनिश्चित करनी चाहिए। इसके अनुसार सीओसी को वैसी समाधान योजना को खारिज करना चाहिए जिसे अध्यादेश से पहले जमा किया गया और उसे अभी मंजूरी नहीं मिली है।        
                     
उल्लेखनीय है कि बैंकों द्वारा जो ऋण कंपनियों को दिया जाता है, वह जन साधारण का ही होता है लेकिन बड़ी कंपनियां कानून के लचीले पन का लाभ उठा कर जन साधारण के धन का इस्तेमाल अपने हित के लिए करती रहती हैं। धन वसूली के लिए बनाए एक्ट रिकवरी ट्रिब्यूनल में स्टाफ की कमी के कारण भी जनता जनार्दन के पैसे की वसूली लटकी रहती है। पिछले दिनों पंजाब व हरियाणा उच्च न्यायालय ने डीआरटी की धीमी प्रक्रिया को लेकर सरकार को नोटिस जारी किया है। कोर्ट को बताया गया था कि 100 बड़े बैंक डिफाल्टरों पर ही 172718 करोड़ बकाया है। केन्द्र सरकार ने बताया कि स्टाफ की कमी को पूरा किया जा रहा है ताकि कर्ज वसूली में कोई दिक्कत न आए। इस पर हाईकोर्ट ने केन्द्र से डेब्ट रिकवरी ट्रिब्यूनल (डीआरटी) में स्टाफ की कमी को पूरा करने के लिए उठाए गए कदमों का ब्यौरा तलब कर लिया है। याचिका में कहा गया है कि भारत में बैंकों से पैसा लेकर वापस न करने की प्रवृत्ति वसूली के लिए बनाए गए डेब्ट रिकवरी ट्रिब्यूनलों की धीमी सुनवाई के चलते बढ़ रही है।  इसी का नतीजा है कि बैंकों से बड़ी राशि उठाने वाले इसका भुगतान नहीं करते हैं और बैंक डीआरटी में वसूली के लिए पहुंचते हैं। इस प्रक्रिया में 5-6 साल का समय लग जाता है। इस बीच बैंक और पार्टी आपस में समझौता कर लेते हैं या फिर आपसी सहमति की राशि अदा कर दी जाती है। इससे लोगों का पैसा कई सालों तक इन कर्जदारों के पास रहता है और देश के विकास में इस्तेमाल नहीं हो पाता है। याची ने चंडीगढ़ में स्थापित डीआरटी 3 के फरवरी में आरंभ होने के बावजूद इसे काम नहीं देने को आधार बनाया गया था। याची ने कहा कि वर्तमान में केवल 35 डीआरटी हैं जो सरकारी बैंकों और वित्तीय संस्थानों के कर्ज वसूली का कार्य करते हैं। चंडीगढ़ में मौजूद तीनों डीआरटी के पास कुल 8 हजार से अधिक मामले लंबित हैं। डीआरटी में 10 लाख से ऊपर की रिकवरी के लिए बैंक केस दाखिल करते हैं। ऐसे में हजारों करोड़ की वसूली की प्रक्रिया यहां चल रही है।

देश के बड़े घरानों की कई कंपनियां तो जनता जनार्दन के धन को अपनी जेब में डालने की ही योजनाएं बनाती हैं। पिछले समय में जब सरकार ने नोटबंदी की थी तो ऐसी ही कंपनियों के माध्यम से करीब 17 हजार रुपये करोड़ 75 हजार कर्मी और 58 हजार बैंक एकाऊंट्स में जमा कराए व निकाले गए थे। रियल एस्टेट में भी बड़ी कंपनियों ने जनता के धन से करोड़ों रुपये कमाए और बाद में जनता को केवल लारे लगाकर स्वयं निदेशक मौज मस्ती करते रहे। अब न्यायालय और सरकार दोनों ऐसी कंपनियों के विरुद्ध सख्त कदम उठा रहे हैं। जिन्होंने जन साधारण के धन और भावनाओं से खिलवाड़ किया है। सरकार द्वारा उठाया कदम देश में जनता जनार्दन के धन को सुरक्षित करेगा ही साथ में कंपनियों से कर्जे वसूली भी तेज होगी। सरकार के उपरोक्त कदम जनहित व देशहित में है। 


 -इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।

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