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सूखने की कगार पर देश की नदियां

Publish Date: November 28 2017 11:49:27am

नदियां मात्र पानी का स्रोत नहीं हैं, मात्र एक  संसाधन नहीं हैं. नदियां हमारी संस्कृति हैं। इतिहास गवाह है कि पुरातन काल से ही नदियों के किनारे अनेक मानव सभ्यताओं ने जन्म लिया। कई संस्कृतियां नदियों के किनारे ही पल्लवित व पुष्पित हुईं। यही कारण रहा होगा कि हमारे ऋषि-मुनियों या पूर्वजों ने उसकी महिमा व महत्व को समझाने के लिए इन नदियों को पवित्र मानकर मां की तरह उन्हें पूजनीय कहा, कई ग्रंथों में भी नदियों की महिमा का वर्णन है। हमारे कई तीज़-त्यौहार, कई मेले आज भी नदियों को केन्द्र में रहकर ही आयोजित किये जाते हैं। हर चौथे वर्ष आयोजित कुम्भ मेले इसी चिंतन परम्परा का सबसे बड़ा उदाहरण हैं।

परन्तु स्थिति अब ऐसी नहीं है। विकास नगरीकरण व औद्योगीकरण के चलते नदियां दिन-प्रतिदिन प्रदूषित होती जा रही हैं। नदियों के किनारे बसे देश, शहर, गांव सभी इलाके खेती के लिए इत्यंत उपजाऊ होते हैं। कई कारणों से ये आर्थिक मज़बूती भी देते हैं। बड़ी-बड़ी नदियों के किनारे संगम तटों पर होने वाले कुम्भ, महाकुम्भ के आयोजन जहां एक तरफ हमें नदियों की महत्ता से रू-ब-रू कराते हैं, वहीं दूसरी ओर इस इलाके के कारोबारियों को आर्थिक रूप से मज़बूत भी करते हैं, परन्तु इसका एक दुखद पहलू यह भी है कि एक ही स्थान पर इतनी तादाद में श्रद्धालुओं के आने से उस स्थान के आसपास कूड़ा-करकट व गंदगी बहुत होती है। गंदगी सिर्फ मेलों व आयोजनों के दौरान ही होती है ऐसा नहीं है। लोभी मानव ने अपने लालच में नदियों को कूड़ा घर बना दिया है। जहां पोलीथीन, प्लास्टिक, मरे जानवर और भी न जाने क्या-क्या समाया है। बड़ी फैक्टरियों से निकलने वाला रसायन, सीवर का गंदा पानी सब हमने नदियों में मिलाकर स्वच्छ पानी को पूरी तरह दूषित कर दिया है। नदियां हमारी जीवन-धारा हैं और हमने इन्हीं धाराओं को विष में तबदील कर दिया है। यही नहीं विकास की राह में नदियों को रोड़ा मानने वाले भी कम नहीं हैं। इस अंधी दौड़ में हमने नदियों को पाटकर उनके ऊपर बिल्ंिडग खड़ी कर दी है। पानी की धारा को अवरुद्ध करने की कोशिशें तबाही का रूप लेकर आती हैं, क्योंकि नदियों की इन बहती धाराओं को जब विरोधी देशों की सरहदें नहीं रोक सकतीं तो आम इन्सान की तो बात ही क्या?
सबसे पवित्र कही जाने वाली गंगा नदी दुनिया की सबसे दूषित नदियों में से एक है। इसी तरह यमुना, साबरमती आदि लगभग सभी नदियों की हालत कमोबेश एक जैसी ही है। इन नदियों के प्रदूषित होने से न केवल पर्यावरण को ही खतरा है वरना सम्पूर्ण विश्व इसकी चपेट में है। वल्र्ड रिसोर्सेज़ रिपोर्ट के अनुसार 70 फीसदी भारतीय गंदा पानी पीते हैं। हैजा, टायफाइड और मलेरिया जैसी कई बीमारियां गंदे पानी की वजह से होती हैं। इससे फसलें भी खराब हो रही हैं। इसलिए आजकल आर्गेनिक फल-सब्ज़ी उगाने पर जोर दिया जा रहा है। नदियों को हम गंदे नालों में परिवर्तन किए जा रहे हैं। पर्यावरण विद् समय-समय पर इस संबंध में चिंता जताते हैं और इस विषय पर गम्भीरता से चेतावनी भी दे चुके हैं, परन्तु हम हैं कि इससे कोई फर्क ही नहीं पड़ता है। हमने तो जैसे ठान रखी है कि हम स्वयं कुछ नहीं कहेंगे, सारी जि़म्मेदारी सरकारों की है। परन्तु सिर्फ सरकार के भरोसे रहने से कुछ नहीं होगा। प्रत्येक नागरिक को इसकी जि़म्मेदारी लेनी ही होगी।

नदियों को स्वच्छ बनाने के लिए वर्षों से अरबों रुपए खर्च हो चुके हैं। कई परियोजनाएं भी चल रही हैं, परन्तु स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। विषय की गम्भीरता को देखते हुए सरकारों को कड़े नियम व कानून भी बनाने होंगे, जोकि धरातल पर काम भी करें, क्योंकि विज्ञापनों व फाइलों से कुछ नहीं होगा और न ही आंकड़ों से। जून, 2014 में पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने संसद में सवाल के जवाब में बताया कि अगर राज्य बार प्रदूषित नदियों का लेखा-जोखा सामने रखा जाए तो पहले नम्बर पर महाराष्ट्र है, जिसकी 28 नदियां प्रदूषित हैं। गुजरात में 19 नदियां, उत्तर प्रदेश में 12, कर्नाटक 11, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु प्रत्येक में 9 नदियां प्रदूषित हैं, जबकि झारखण्ड, उत्तराखंड, हिमाचल जैसे राज्य भी इससे अछूते नहीं हैं। अरबों रुपए खर्च करने के बावजूद आज भी नदियां दूषित हैं।

जितनी शिद्दत से हमारी नदियों को साफ करने की परियोजनाएं, योजनाएं बनाई जाती हैं, उतनी ही ईमानदारी से धरातल पर कार्य भी हो तो नदियां साफ हो सकती हैं। इन सब प्रयासों में सिर्फ सरकारी विभागों पर ही निर्भर रहना उचित नहीं होगा। देश के प्रत्येक जन को इसके लिए अपना पूर्ण योगदान देना होगा, क्योंकि नदी एक दिन में किसी एक व्यक्ति ने गंदी नहीं की है। हम सभी ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। इन जीवन धाराओं को स्वच्छ, निर्मल बनाने के लिए कड़े कानूनों की भी दरकार है। नहीं तो गंगा, यमुना भी कहीं सरस्वती नदी की तरह लुप्त न हो जाएं और आने वाली पीढिय़ां, इनको मिथ मानकर किस्से कहानियों में न पढऩे लगने लगें।
लेखक आरती लोहनी
 

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