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फिल्म पद्मावती, जलवों और जौहर में अंतर जरूरी

Publish Date: November 30 2017 12:18:53pm

संजय लीला भंसाली की नई फिल्म पद्मावती की काफी चर्चा है। भंसाली हिंदी फिल्म जगत के बहुचर्चित व विख्यात निर्माता हैं। बाजीराव मस्तानी जैसी ऐतिहासिक फिल्मों के साथ-साथ उन्होंने अनेक ऐसी फिल्में बनाई हैं जो हिंदी फिल्म इतिहास के गौरवशाली पन्ने हैं लेकिन उनकी आने वाली फिल्म पद्मावती को लेकर जो कहने सुनने में मिल रहा है उस पर केवल इतना ही कहा जा सकता है कि उन्हें जौहर व जलवों के बीच अंतर करना सीखना होगा। 

उनकी नई फिल्म में चित्तौडग़ढ़ की महारानी पद्मावती को लेकर न केवल राजपूत समाज बल्कि पूरा देश आशंकित है कि उनकी गरिमा को लेकर इस तरह के दृश्य फिल्म में फिल्माए गए हैं जो न तो इतिहास से मेल खाते हैं और न ही महारानी के चरित्र से। अपने उच्च चरित्र व अस्मिता की रक्षा आदि गुणों के लिए 16000 महिलाओं के साथ जौहर करने वाली रानी पद्मावती को भारतीय समाज सीता, द्रौपदी, रानी अहिल्या, अनुसूया जैसी प्रात: वंदनीय महिलाओं की श्रेणी में रखता है और ऐसी महिला की शान के खिलाफ कुछ भी सुनने को कोई तैयार नहीं होगा जो इतिहास के भी खिलाफ हो। रानी पद्मावती का इतिहास केवल जौहर ही नहीं बल्कि गोरा-बादल के अदम्य साहस, देशभक्ति, स्वामी भक्ति का भी इतिहास है जो हर भारतीय की नसों में जोश बन कर दौड़ता है।

इतिहासकार बताते हैं कि रानी पदमिनी के पिता गंधर्वसेन और माता चंपावती थीं। गंधर्वसेन सिंहल प्रान्त के राजा थे।  पदमिनी बचपन से ही बहुत सुंदर थी और बड़ी होने पर उसके पिता ने उसका स्वयंवर आयोजित किया। राजा रावल रतन सिंह ने स्वयंवर जीत कर पदमिनी से विवाह कर लिया। राजा रावल रतन सिंह एक अच्छे शासक और पति होने के अलावा कला के संरक्षक भी थे। उनके दरबार में कई प्रतिभाशाली लोग थे जिनमें से राघव चेतन संगीतकार भी एक था। वह दुष्ट जादूगर भी था और जब उसने अपने काला जादू की कला को राजघराने पर ही आजमाना चाहा तो रतन सिंह ने उसे अपने राज्य से निर्वासित कर दिया। नाराज हो कर वह दिल्ली चला गया जहां उसने सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी को राजा रतन सिंह के खिलाफ भड़काया और रानी पद्मावती की सुंदरता का बखान किया जिसे सुनकर खिलजी की वासना जाग उठी। अपनी राजधानी पहुंचने के तुरंत बात उसने अपनी सेना को चित्तौड़ पर आक्रमण करने को कहा क्योंकि उसका सपना उस सुन्दरी को अपने हरम में रखना था।

बेचैनी से चित्तौड़ पहुंचने के बाद अलाउद्दीन को किला भारी रक्षण में दिखा। रानी की एक झलक पाने के लिए सुल्तान बेताब हो गया और उसने राजा रतन सिंह को यह कहकर भेजा कि वो रानी पदमिनी को अपनी बहन समान मानता है और उससे मिलना चाहता है। सुल्तान की बात सुनते ही रतन सिंह उसके रोष से बचने और अपना राज्य बचाने के लिए उसकी बात से सहमत हो गया। रानी पदमिनी अलाउद्दीन को कांच में अपना चेहरा दिखाने के लिए राजी हो गयी। जब अलाउद्दीन को ये खबर पता चली कि रानी पदमिनी उससे मिलने को तैयार हो गयी है वो अपने चुनिन्दा योद्धाओं के साथ सावधानी से किले में प्रवेश कर गया। रानी पदमिनी को कांच के प्रतिबिंब में जब अलाउद्दीन खिलजी ने देखा तो उसने सोच लिया कि रानी पदमिनी को अपनी बनाकर रहेगा। वापस अपने शिविर में लौटते वक्त अलाउदीन कुछ समय के लिए रतन सिंह के साथ चल रहा था। खिलजी ने मौका देखकर रतन सिंह को बंदी बना लिया और पदमिनी की मांग करने लगा हालांकि कुछ विद्वान यह कहते हुए कांच में दर्शन दीदार के प्रसंग को गलत बताते हैं कि उस समय कांच का आविष्कार ही नहीं हुआ था।

राजपूत सेनापति गोरा और बादल ने अपने राजा को मुक्त करवाने के लिए खिलजी को संदेश भेजा कि अगली सुबह पदमिनी को सुल्तान को सौंप दिया जाएगा। भोर होते ही 15० पालकियां किले से खिलजी के शिविर की तरफ रवाना हुई। उन पालकियों में न ही उनकी रानी और न ही दासियां थी और अचानक से उसमे से पूरी तरह से सशस्त्र सैनिक निकले और रतन सिंह को छुड़ा लिया और खिलजी के अस्तबल से घोड़े चुराकर तेजी से घोड़ों पर पर किले की ओर भाग गये। गोरा इस मुठभेड़ में बहादुरी से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हो गये जबकि बादल ने रतन सिंह को सुरक्षित किले में पहुंचा दिया। जब सुल्तान को पता चला कि उसके योजना नाकाम हो गयी तो सुल्तान ने गुस्से में आकर अपनी सेना को चित्तौड़ पर आक्रमण करने का आदेश दिया। किले की घेराबंदी के कारण खाद्य आपूर्ति धीरे धीरे समाप्त हो गयी। अंत में रतन सिंह ने द्वार खोलने का आदेश दिया और सुल्तान के  सैनिकों से लड़ते हुए रतन सिंह वीरगति को प्राप्त हो गये। इस पर रानी पद्मावती ने 16000 रानियों, सखियों के साथ जौहर कर लिया।  

दुनिया के इतिहास में यह पहली व आखिरी घटना है जब महिलाओं ने अपनी आबरू बचाने के लिए इतना बड़ा बलिदान दिया हो। आज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर इस तरह की महान महिला को फिल्मी पर्दे पर नाचते हुए दिखाना या खिलजी की कल्पना का सहारा लेकर उसके साथ प्रेमप्रसंगों में लिप्त दिखाना एक आदर्श पर पूजनीय महिला का सरासर अपमान है। यह ठीक है कि बिना नाच गाने व केवल नीरस ऐतिहासिक घटना के आधार पर फिल्मों का निर्माण संभव नहीं है परंतु जौहर व जलवों में अंतर तो करना ही होगा।        
         
लेखक, राकेश सैन
 

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