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नदी जोड़ अभियान से बढ़ेंगे समाज में झगड़े

Publish Date: December 02 2017 01:44:06pm

खजुराहो (मध्य प्रदेश) (उत्तम हिन्दू न्यूज): स्टॉक होम वॉटर प्राइज से सम्मानित जलपुरुष के नाम से चर्चित राजेंद्र सिंह का मानना है कि नदियों के जोडऩे से जल समस्या का समाधान संभव नहीं है, बल्कि यह समाज के लिए खतरनाक है, क्योंकि इससे झगड़े बढ़ेंगे। मध्य प्रदेश की पर्यटन नगरी में शनिवार से शुरू हो रहे दो दिवसीय राष्ट्रीय जल सम्मेलन में हिस्सा लेने आए सिंह ने शुक्रवार को आईएएनएस से कहा, "नदियों को जोडऩे से सूखा और बाढ़ की समस्या का निदान हो जाएगा, यह सोचना गलत है, क्योंकि पूर्व के अनुभव अच्छे नहीं हैं। सतलुज, यमुना और व्यास नदियों का जोड़ इसकी गवाही देता है। हरियाणा और राजस्थान को पंजाब पानी को अपना बताते हुए, दूसरे राज्यों को देने को तैयार नहीं होते। इससे झगड़े ही बढ़े, 50 साल बाद भी इस विवाद का निपटारा नहीं हो पा रहा है।"वह आगे कहते हैं, "भारतीय लोकतंत्र, संसद और संविधान भी उन राज्यों के साथ न्याय नहीं कर पा रहे हैं, नदियों को जोडऩे से पानी संबंधी समस्या का समाधान तो नहीं होगा, बल्कि देश में दरार पैदा जरूर होगा। जरूरत नदियों को जोडऩे की नहीं, दिल और दिमाग को नदियों से जोडऩे की है। ऐसा करने में सफल रहे तो नदियों को पुनर्जीवित करना कठिन नहीं होगा।"

राजेंद्र बताते हैं, "जब रेगिस्तान में नदियों को प्रवाहमान बनाया जा सकता है तो देश के किसी भी हिस्से की नदियों को पुनर्जीवित किया जा सकता है। महाराष्ट्र के सतारा और सांगली के अलावा जब कर्नाटक में नदियों को प्रवाहमान बनाया जा सकता है, तो शेष नदियों को प्रवाहमान क्यों नहीं बनाया जा सकता।" बुंदेलखंड में केन-बेतवा नदियों के जोड़ की बात कहीं जा रही है। कहा यह जा रहा है कि केन में ज्यादा और बेतवा नदी में पानी कम होता है, दोनों नदियों को जोड़कर इस इलाके को खुशहाल बनाने की बात कही जा रही है। राजेंद्र ने कहा, "दोनों नदियों के कैचमेंट क्षेत्र में समान वर्षा होती है, यहां की पर्यावरणीय और भौगोलिक स्थिति समान है, तो ऐसा कहना सही नहीं है कि एक नदी में पानी ज्यादा और एक में कम पानी होता है। वास्तविकता यह है कि जंगल क्षेत्र के पानी का बेहतर तरीके से उपयोग नहीं कर पाते, जिसकी वजह से नदी में प्रवाह नहीं होता।"

एक सवाल के जवाब में सिंह ने कहा, "बुंदेलखंड उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश का हिस्सा है, दोनों जगह के इंसान और प्रकृति का चरित्र एक समान है, इसलिए जरूरी है कि हम प्यार, लगाव और सम्मान करें प्रकृति का। अगर समाज ऐसा करे तो प्रकृति हमारी जरूरत पूरी करेगी।" उन्होंने कहा, "ठेकेदार और औद्योगिक घरानों के इशारे पर केन-बेतवा को जोडऩे की योजना बनाई गई है। सरकार को न तो जनता की चिंता है और न ही प्रकृति की। एक व्यक्ति और दूसरे व्यक्ति का रक्त रंग में तो एक होता है, मगर चरित्र अलग होता है, अगर दोनों का रक्त मिला दिया जाए, तो आपदा हो जाएगी। ठीक यही आपदा नदियों के जोडऩे से आने वाली है।"

वह आगे कहते हैं, "हर नदी का अपना जीन पूल होता है, मिट्टी की तासीर होती है, उनकी अपनी विविधता होती है। यह समझना होगा कि केन और बेतवा नदी की प्रकृति कैसी है। दोनों नदियां एक ही क्षेत्र में हैं, मगर उनके कुछ हिस्से में जीन पूल अलग है, मिट्टी की प्रकृति अलग है। इन दोनों नदियों को मिलाया गया तो आज नहीं मगर दो-तीन दशक बाद लोगों को समझ में आएगा कि यह विनाश का कारण नदी जोड़ बना है।"उन्होंने आगे कहा, "देश औद्योगिक घरानों के इशारे पर चल रहा है। सरकार अडानी और अंबानी के इशारे पर चल रही है। नदियों और वनों पर इन घरानों का कब्जा है। आज देश में लोकतंत्र जनता का नहीं है, बल्कि लोकतंत्र उद्योगपतियों का है।"

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