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महंगाई से त्रस्त आम आदमी

Publish Date: December 04 2017 01:01:51pm

दो माह में सब्जियों की महंगाई दर दो गुना बढ़ जाना आम आदमी के लिए बुरी खबर है। प्याज काटने में तो आंसू निकलते ही थे, अब खरीदने में भी आंसू निकल रहे हैं। वहीं लाल टमाटर भी गुस्से में दिख रहा है, तभी तो वो आम आदमी की पहुंच से दूरी बनाये हुए है। प्याज, टमाटर की भंाति खाद्य पदार्थों और सब्जी की कीमतों में बढ़ोत्तरी तो बीते छह महीनों से जारी  थी,  फिर भी सब्जियों की महंगाई दर सितंबर की 3.92 फीसदी के मुकाबले आज साढ़े सात फीसद तक पहुंच चुकी है। प्याज और टमाटर तो गरीबों की पहुंच से बाहर हो चुके हैं। ये मुद्रास्फीति आर्थिक नियमन पर गहराते बादलों के संकेत हैं। अब उपभोक्ता मुद्रास्फीति अक्तूबर में सात महीने की ऊंचाई पर पहुंच गई जबकि खाद्य और ईंधन की बढ़ती कीमतों की वजह से थोक मुद्रास्फीति छह महीने के उच्च स्तर पर थी। 

दरअसल, बढ़ती मुद्रास्फीति ने  सुधार की उम्मीदों पर फिर से पानी फेरने वाला काम किया है। रिजर्व बैंक की कोशिश रहती है कि मुद्रास्फीति 4 फीसदी से कम रहे ताकि वह आर्थिक सुधारों के बाबत कदम उठा सके। मौजूदा मुद्रास्फीति की हालत में आरबीआई से भी तत्काल किसी राहत घोषणा करने की संभावना नहीं दिख रही है। दिल्ली दरबार के अलंबरदारों के लिए आने वाले दिन और मुश्किल भरेे नजर आ रहे हैं। देश की वह जमापूंजी तेजी से छीजती जा रही है जो उसने दुनिया भर में छाई कच्चे तेल की मंदी से कमाई थी। अब तो पेट्रोलियम कीमतों में तेजी का रुख है।  तेल उत्पादक (ओपेक) देशों ने अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में बढ़ोत्तरी का जो फैसला किया है वह दीर्घकालिक होने की संभावना  है।

पेट्रोल-डीजल के दाम बढऩे से महंगाई पर असर पड़ता है जो कि हर भारतीय आम नागरिक का पुराना अनुभव है लेकिन केन्द्र सरकार ने जब वस्तु एवं सेवाकर यानी जीएसटी लागू करने का ऐलान किया था, तब तर्क दिया था कि इससे वस्तुओं व सेवाओं की कीमतें घटेंगी मगर जीएसटी लागू होने के शुरूआती चरण में ही महंगाई पिछले पांच महीने से अपने ऊंचे स्तर पर पहुंची दिखाई दे रही है।
हालांकि जीएसटी कर प्रणाली में अनेक आम उपभोक्ता वस्तुओं पर करों की दर काफी कम रखी गई है, फिर भी यदि खुदरा बाजार में आम वस्तुओं की कीमतें बढ़ी हैं तो इसके कारणों को जानना काफी जरूरी है। तर्क दिया जा रहा है कि अभी जीएसटी प्रणाली का शुरूआती दौर है और कई कारोबारी अभी भी भ्रमित हैं। वे अपने तरीके से वस्तुओं की कीमतें तय करके बेच रहे हैं मगर थोक मूल्य सूचकांक में महंगाई की दर बढ़कर 3.36 फीसदी तक है तो यह केवल भ्रम के चलते तो नहीं हो सकता।
मार्केट इकोनामी के नाम पर अब पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों को बेलगाम कर दिया गया है। ऐसा हो रहा है कि हुकूमत द्वारा महंगाई के दावानल में पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस को भी डाल दिया गया। महंगाई के प्रश्न पर आम आदमी का रोष इसलिए भी राजनीतिक जोर नहीं पकड़ रहा कि प्राय: सभी राजनीतिक दलों के नेताओं का अपना चरित्र भी कार्पोरेट परस्त होता जा रहा है। संसद के सदस्य अपना वेतन अब बीस हजार से बढ़ाकर नब्बे हजार करने जा रहे हैं जो कि हुकूमत के सेक्रेटरी रैंक के अफसर के वेतन के समकक्ष होगा। सरकारी आंकड़े खुद ही बयान करते हैं कि गत वर्ष के दौरान खाने-पीने की वस्तुओं के दाम 16.5 की इन्फ्लेशन की दर से बढ़े हैं। चीनी के दाम 73 फीसदी, मूंग दाल की कीमत 113 फीसद, उड़द दाल के दाम 71 फीसद, अनाज के दाम 2० फीसद, अरहर दाल की कीमत 58 फीसद और आलू-प्याज के दाम 32 फीसद बढ़ गए हैं।

अभी पेट्रोल-डीजल महंगा है। फलों व सब्जियों के भाव ऊंचे हैं तो अब रोजमर्रा के काम में आने वाली दालों के भाव बढ़ रहे हैं। पिछले एक महीने में दालों के भावों में 20 से 30 फीसदी की बढ़ोत्तरी देखी जा रही है। दालों के खुदरा ही नहीं बल्कि थोक भाव भी बढ़ रहे हैं। एक माह पहले चने की दाल 6०-65 रुपये प्रतिकिलो थी लेकिन वर्तमान में यह दाल 8० रुपये किलो पहुंच गई है। अन्य दालों के भावों में भी इजाफा हुआ है।

दाल विक्रेताओं का कहना है कि केन्द्र सरकार ने दालों के आयात पर रोक लगा रखी है और उसी वजह से दालों की कीमतों पर असर पड़ रहा है। यदि ऐसा है तो फिर सरकार को ही इस मसले पर विचार करना चाहिए लेकिन सवाल यह है कि केन्द्रीय कर प्रणाली लागू होने के बाद भी अगर महंगाई पर काबू नहीं पाया जा रहा है तो आगे इससे निजात कैसे दिलाई जा सकेगी। एक बात तो यह समझ में आ रही है कि सरकार ने करों की दोहरी व्यवस्था बना रखी है। एक तरफ जरूरी वस्तुओं के करों को कम रखा है तो खान-पान संबंधी अन्य वस्तुओं व तैयार भोजन की कर राशि को बढ़ा रखा है। फिर देखा यह भी जा रहा है कि जीएसटी में करों की दर तय करते समय अपेक्षित सावधानी नहीं बरती गई है। इसके चलते ही सरकार को बार-बार करों की समीक्षा करनी पड़ रही है। हाल में ही सरकार को कम से कम तीस वस्तुओं के करों को कुछ कम करने पर मजबूर होना पड़ा। कर प्रणाली दुरूस्त नहीं होने के कारण ही खुदरा कारोबार में महंगाई बढ़ रही है। महंगाई पर काबू पाना और विकास दर को ऊंचे स्तर पर पहुंचाना मोदी सरकार का संकल्प है जबकि अभी तो महंगाई की दर बढ़ रही है तो विकास दर घटती नजर आ रही है। जीएसटी लगने से पूर्व महंगाई काबू में आती दिख रही थी, लेकिन नई कर प्रणाली लागू होने के बाद यह फिर बढ़ती नजर आ रही है। 

जाहिर होता है कि जीएसटी लगने के बाद उत्पादन और विपणन के स्तर में कमी आई है। नोटबंदी के बाद अनेक कारोबार पहले ही प्रभावित हो गए थे और उसके बाद जीएसटी लागू होने से सभी कारोबारियों के सामने कई तरह की परेशानियां खड़ी हो गई और काफी कारोबारी भ्रम की स्थिति में पड़ गए। लगता है अभी भी कई खुदरा कारोबारी जीएसटी को लेकर भ्रमित हैं। सरकार थोक मूल्य सूचकांक के आधार पर महंगाई का स्तर तय करती है जबकि खुदरा बाजार में वस्तुओं की कीमतें कई गुना अधिक होती हैं। सरकार को जीएसटी प्रणाली को व्यावहारिक व तार्किक बनाने का प्रयास करना होगा। ऐसा नहीं किया गया तो सरकार का संकल्प पूरा होने में संदेह ही है। हिन्दुस्तान के आजाद होने के बावजूद कृषि और कृषक संबंधी ब्रिटिश राज की रीति-नीति में कोई बुनियादी बदलाव नहीं आया। आज भी लगभग वही कानून चल रहे हैं जो अंग्रेजों के शासनकाल में चल रहे थे। देश का 8० करोड़ किसान शासकीय नीति से बाकायदा उपेक्षित है। गत दो वर्षों के दौरान देश का किसान और अधिक गरीब हुआ है जबकि उसके द्वारा उत्पादित खाद्य पदार्थों के दामों में भारी इजाफा दर्ज किया गया। यह समूचा मुनाफा अमीरों की जेबों में चला गया। देश के अमीरों की अमीरी ने अद्भुत तेजी के साथ कुलांचें भरीं। मंत्रियों और प्रशासकों के वेतन में जबरदस्त वृद्धि हो गई। दूसरी ओर साधारण किसानों में गरीबी का आलम है। आम आदमी की रोटी-दाल किसानों ने नहीं वरन बड़ी तिजोरियों के मालिकों ने दूभर कर दी है। सरकार पेट्रोल और डीजल की कीमतों में इजाफा करने की स्थिति में नहीं है, इसलिए इसे और अधिक उधार लेने के लिए राजकोषीय घाटे के लक्ष्य के पूरा होने की उम्मीद छोडऩी पड़ सकती है। इस स्थिति में वित्त मंत्री अरुण जेटली को किस्तों में जीएसटी सुधार की नीति को छोड़ देना चाहिए। उन्हें जल्द ही एक स्थिर और निवेशक-अनुकूल कराधान व्यवस्था बनाने पर ध्यान देना चाहिए। 

संतोष कुमार भार्गव, लेखक 

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