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मोदी-शाह के लिए धर्मयुद्ध है गुजरात चुनाव

Publish Date: December 06 2017 12:15:27pm

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के लिये गुजरात विधानसभा चुनाव धर्मयुद्ध की शक्ल अख्तियार कर चुका है। इस बार इन दोनों महारथियों को गुजरात फतह के लिये शायद पहली दफा इतना पसीना बहाना पड़ रहा है। प्रधानमंत्री मोदी फोन पर गुजरात के चुनावी बूथ कार्यकर्ताओं से बात कर रहे हैं। उनसे माहौल का जायजा ले रहे हैं और चुनाव में जुटने को प्रोत्साहित कर रहे हैं। इन संवादों में प्रधानमंत्री ने जीएसटी को एक 'गलत फैसलाÓ माना है लेकिन वह सवाल भी कर रहे हैं कि क्या  इसी आधार पर हिंदू विरोधियों को वोट दिए जा सकते हैं? हमारी सरकार से गलती हुई है, तो हम ही सुधार करेंगे। प्रधानमंत्री मोदी के इस बुनियादी कथन को लेकर भाजपा के काडर नेता, खासकर व्यापारियों और पटेलों के बीच प्रचार कर रहे हैं। 

प्रधानमंत्री अपने कार्यकर्ताओं से जो बातचीत कर रहे हैं, उसका हमने शाब्दिक भाव व्यक्त किया है। शब्दश: पर हमारा कोई दावा नहीं है लेकिन गुजरात को लेकर प्रधानमंत्री मोदी निश्चिंत नहीं हैं। सवाल जीत-हार का नहीं है। उसके मद्दे नजर भाजपा और कांग्रेस के बीच इतना अंतर है कि जीत तो भाजपा की ही निश्चित है लेकिन प्रधानमंत्री पटेलों की नाराजगी मोल लेना नहीं चाहते। प्रधानमंत्री की कोशिश है कि गुजरात के चुनाव जातीय आधार पर न लड़े जाएं बल्कि हिंदू-मुसलमान के विभाजन पर ही हों, लिहाजा पटेलों को मनाया-पटाया जा रहा है। 

पाटीदार आंदोलन को विभाजित कर दिया गया है। कई बड़े पाटीदार नेता अपने संयोजक हार्दिक पटेल का साथ छोड़ भी चुके हैं और अब वे भाजपा के पाले में हैं। इसी सियासत के दरमियान प्रधानमंत्री मोदी अक्षरधाम मंदिर के रजत जयंती समारोह में शामिल हुए। सवाल किया जा रहा है कि क्या यह मोदी का 'धर्मयुद्ध' है ताकि अधिकतर पटेल भाजपा का साथ छोड़ कर न जाएं? 

गौरतलब है कि करीब 25 लाख भक्त अक्षरधाम मंदिर और स्वामीनारायण संप्रदाय के हैं जिनमें से करीब 8० फीसदी पटेल हैं। अक्षरधाम मंदिर जाने से ही पटेलों की नाराजगी समाप्त हो जाएगी और एक बार फिर वे भाजपा को वोट देंगे? यह सवाल पेचीदा है। और फिर प्रधानमंत्री मोदी ने अक्षरधाम मंदिर के मंच से आध्यात्मिक सा भाषण ही दिया। चूंकि मंदिर के प्रमुख स्वामी का मोदी के प्रति स्नेह 'पितृतुल्य' था, लिहाजा प्रधानमंत्री ने कुछ पुराने संस्मरण जरूर सुनाए लेकिन पटेलों को लेकर एक राजनीतिक यथार्थ यह भी है कि वे बुनियादी तौर पर कांग्रेस को एक 'मुस्लिमवादी' पार्टी मानते रहे हैं जबकि पटेल सोच और आस्था के आधार पर 'हिंदूवादी' हैं। अक्षरधाम जाकर प्रधानमंत्री मोदी ने यह भाव जरूर दिया है कि वह एक धर्मपरायण व्यक्ति पहले हैं और यह भाव पटेलों को प्रभावित कर सकता है। 


गुजरात में आज का पटेल 'हार्दिक' है, 'सरदार' के सामने जिसका अस्तित्व और व्यक्तित्व बेहद बौना है। क्या गुजरात में कोई मौजूदा मुद्दा नहीं है? क्या कोई समस्या शेष नहीं है? क्या चुनाव के दौरान भी इतना वक्त है कि अतीत और इतिहास को खंगाला जा रहा है? क्या गुजरात का वर्तमान बिलकुल खोखला और भयावह है जो सरदार पटेल का सहारा लिया जा रहा है? 'सरदार' ऐसा शब्द है जो वाकई 'सरदार' है। आज भाजपा और कांग्रेस दोनों ही 'सरदार' के नाम की माला जप रही हैं। क्या दोनों पार्टियों के पास ऐसा कोई कार्यक्रम और नीतियां नहीं हैं, चुनावों में जिनकी घोषणा कर वे जनादेश हासिल कर सकें? क्या दोनों ही दल एक नई, लंबी लकीर खींचने में अक्षम हैं? 

अब कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भी पहली बार 'जय पटेल' के नारे लगवाए हैं। यह इतिहास-पुरुष सरदार पटेल का स्मरण नहीं है बल्कि उस वोट बैंक की जय-जयकार है जो गुजरात में कमोबेश 41 विधानसभा सीटों पर वर्चस्व रखता है लेकिन करीब 80 फीसदी पटेल परंपरागत तौर पर भाजपा को वोट देते आए हैं। बेशक 'जय पटेल' में सरदार पटेल का भाव भी निहित हो सकता है लेकिन सियासी तौर पर यह 'जातीय पटेल', यानी पाटीदार, का जातिवादी जुमला है। 
कृपया हमारे उस 'सरदार' को अपमानित न करें जो राष्ट्र की एकता और अखंडता के प्रतीक हैं। उनके प्रयासों और सूझबूझ की बदौलत ही 562 रियासतों का भारतीय गणराज्य में विलय संभव हो पाया। 'सरदार' के मामले में राहुल गांधी प्रधानमंत्री मोदी की नकल न करें। 

सरदार पटेल कोई चुनावी मुद्दा नहीं हैं। हार्दिक पटेल अभी तक कांग्रेस से पाटीदारों के आरक्षण पर कोई स्पष्ट आश्वासन नहीं ले सके हैं। अब फैसला कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पर टाल दिया गया है। उन्हें क्या पता कि आरक्षण किन संवैधानिक आधारों पर दिया जाता है? वह फिर कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी या चिदंबरम सरीखे कानूनविदों से ही पूछ कर बताएंगी। बहरहाल मुद्दा सरदार पटेल का नाम भुनाने का है। क्या गुजरात के 16-18 फीसदी पटेल 'सरदार' का नाम लेने पर ही वोट दे देंगे? 

गुजरात में पाटीदार और ओबीसी के बीच टकराव रहा है। हार्दिक, अल्पेश, जिग्नेश की राजनीति अलग-अलग रही है। अब भी जिग्नेश ने तो साफ ऐलान कर दिया है कि वह कांग्रेस या किसी अन्य पार्टी में शामिल  नहीं होंगे। हार्दिक ने अभी तक राहुल गांधी के साथ मंच साझा नहीं किया है। मुलाकात करने भी रात के अंधेरे में, होटल के पिछवाड़े से वह गए और राहुल से मिले। पाटीदारों को आरक्षण कैसे दिया जाएगा, उसका कोई संवैधानिक फार्मूला अभी तक कांग्रेस नहीं दे सकी है। पाटीदारों के खिलाफ केस तो भाजपा सरकार ने भी वापस ले लिए हैं। बिना आरक्षण की गारंटी के हार्दिक कांग्रेस का समर्थन कैसे करेंगे, यह भी यक्ष प्रश्न है। 
इनके अलावा गुजरात में पूर्व मुख्यमंत्री शंकर सिंह वघेला की पार्टी और शरद पवार की पार्टी एनसीपी सभी सीटों पर चुनाव लड़ेंगी। निश्चित तौर पर वे कांग्रेस के ही वोट काटेंगी। इस तरह ये तमाम राजनीतिक शक्तियां 'वोटकटवा' के किरदार में होंगी। लिहाजा प्रधानमंत्री मोदी का पूरा ध्यान पटेल वोट बैंक पर है। फिलहाल भाजपा में 22 पटेल विधायक हैं। उनमें से कुछ बदले जाएंगे लेकिन उनका वर्चस्व कायम रखा जाएगा।
गुजरात के चुनावों में कमोबेश सरदार पटेल को मुद्दा न बनाया जाए। गुजराती बड़े समझदार हैं। वे राजनीतिक दलों का मनोरथ भांप रहे हैं और पटेल के नाम पर बिलकुल भी वोट नहीं देंगे। आज ही ऐसी व्याख्याएं न की जाएं कि  सरदार पटेल धर्मनिरपेक्ष थे, सांप्रदायिक नहीं थे। 'सरदार' पूरी तरह, चेतना के स्तर तक राष्ट्रवादी और भारतवादी थे। गृह मंत्री के तौर पर आरएसएस पर पाबंदी थोपना उनका एक निर्णय था, लेकिन उसका पश्चाताप उन्होंने क्या किया? यह भी ऐतिहासिक दस्तावेज है, इस पर फिर कभी चर्चा करेंगे। 
गुजरात मोदी-शाह के लिए 'धर्मयुद्ध' इसलिए है कि जीत का अंतर सिकुडऩा नहीं चाहिए क्योंकि 2019 का मिशन ऐसे ही जनादेशों पर आधारित होगा। 'धर्मयुद्धÓ अपने परंपरागत वोट बैंक को सहेज कर रखने का भी है। जाहिर है कि जीएसटी में कुछ और रियायतों और संशोधनों की घोषणा भी की जा सकती है या ऐसे संकेत दिए जा सकते हैं कि चुनावों के बाद सब कुछ ठीक कर दिया जाएगा। अभी आदर्श आचार संहिता का बंधन है। गुजरात मोदी के 'धर्मयुद्ध' की अग्निपरीक्षा भी है।              
     (अदिति)

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