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दुनिया के सामने वैश्विक आतंक से निपटने की बड़ी चुनौती

Publish Date: December 07 2017 01:35:45pm

दुनियां में बढ़ते इस्लामिक और वैश्विक आतंकवाद ने एक बार फिर दुनिया की सबसे बड़ी ताकत अमेरिका और उसकी खुफिया संगठन एफबीआई को चौंका दिया है। न्यूयार्क के लोअर मैनहटन में साइकिल परिपथ पर हुए लोन वुल्फ हमले में जहाँ निर्दोष आठ अमेरिकी नागरिकों को मौत की नींद सुला दिया, वहीं दुनिया में सबसे सुरक्षित देश कहलाने वाले अमेरिका की सुरक्षा व्यवस्था सवालों के घेरे में है। हमले में 12 लोग घायल भी हुए हैं। लोन  वुल्फ हमले की साजिश रचने वाला आतंकी उजबेकिस्तान का सैफुल्लो सैपोव है।  


पुलिस अधिकारियों के मुताबिक जब वह ट्रक से कूदा तो 'अल्लाह हो अकबर' चिल्ला रहा था। यह हमला वल्र्ड ट्रेड सेंटर से महज दस किमी दूर है। आतंकी ने किराए कर ट्रक लिया था। उसने स्कूली वैन से भी टक्कर मारी जिसमें दो मासूम बच्चे हुए हैं जबकि साइकिल पथ पर चल रहे आठ लोगों की कुचलने से मौत हो गई। ट्रक रुकने के बाद हमलावर दोनों हाथों में गन लेकर उतरा लेकिन यह नकली थी। अगर असली बंदूक होती तो हादसा और भयावह होता जिसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती थी लेकिन पुलिस ने उसे मार गिराया। लोन वुल्फ हमला करने वाला आतंकी 2०1० में अमेरिका आया था और उसके पास फ्लोरिडा का ड्राइविंग लाइसेंस था। वह न्यू जर्सी में दस सालों से रह रहा था। 

मैनहटन में हुए इस आतंकी हमले के बाद अमेरिका के साथ पूरी दुनिया सकते में है क्योंकि बगदादी के गुर्गों ने दुनियां भर में आतंकी तबाही मचाने के लिए जो रास्ता तैयार किया है,  उससे निपट पाना आसान नहीं है। दुनिया भर में लोन वुल्फ हमले बढ़े हैं। जुलाई 2०16 में फ्रांस के नीस में हमले में 86 लोग मारे गए थे। इसके बाद लंदन, बर्लिन और दूसरे शहरों में इस तरह के आतंकी हमले हुए हैं। सीरिया, इराक और अफगानिस्तान में आईएएसआई के खिलाफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प की नीति खुद अमेरिका के लिए भारी पडऩे लगी है। अमेरिका की कमान सम्भालने के बाद से ही ट्रम्प इस्लामिक आतंकवाद को लेकर सख्त हैं। अमरीका प्रवेश पर सात इस्लामिक देशों के खिलाफ प्रतिबंध लगाकर उन्होंने अपनी नीति को साफ कर दिया था लेकिन उनके इस आदेश पर सिएटल की निचली अदालत ने प्रतिबंध लगा दिया था। उदारवादी संगठनों ने इसकी तीखी निंदा की थी। अमेरिका जैसे सुरक्षित देश में यह पहला हमला नहीं है। दर्जन भर से अधिक आतंकी हमले हो चुके हैं। वल्र्ड ट्रेड सेंटर पर 9/11 को हुए हमले में तीन हजार लोगों की मौत हुई थी। अमेरिका इस हमले को लेकर बेहद गम्भीर है। ट्रम्प ने आतंक के खिलाफ अपनी नीति साफ करते हुए कहा है कि मध्यपूर्व में हम आतंकी साजिश को कामयाब नहीं होने देंगे। यह हमला इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ ट्रम्प की मुहिम के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है क्योंकि अमेरिका जैसे सुरक्षित देश में बाहर से आतंकवादियों का घुसना मुशिकल ही नहीं

नामुमकिन भी है, इसलिए अलकायदा और बगदादी के लड़ाके सम्बन्धित मुल्कों में ही अपनी फौज तैयार करने में जुटे हैं। यह हमला उसी की एक बानगी है। अमेरिका में ओबामा शासन के अंत और ट्रम्प के उदय के बाद आतंक के खिलाफ काफी बदलाव देखने को मिला है। उसकी निगाह में आतंकवाद अच्छा और बुरा नहीं हो सकता। आतंकवाद सिर्फ आतंकवाद है। इस्लामिक आतंकवाद के पोषक पाकिस्तान के खिलाफ एक के बाद एक त्वरित अमेरिकी सीनेट के फैसले से स्थितियां बदल गयी हैं। इससे यह साबित हो गया है कि आतंकवाद पर अमेरिका की नीति दूसरे देशों से पूरी तरह अलग, खुली और पारदर्शी है। इस पर कोई आशंका नहीं दिखाई जा सकती जिसकी वजह से आईएसआई, अलकायदा और आतंक का पोषण करने वाला पाकिस्तान और चीन यह बात पचा नहीं पा रहा है।  भारत जहां आतंकवाद के खिलाफ अमेरिका का भरोसा जीतने में कामयाब हुआ है, वहीं दुनिया के अधिकांश मुल्कों को वैश्विक आतंकवाद के खिलाफ एक मंच पर लाने में भी कामयाबी मिली है जिसकी वजह है कि आज अमेरिका, ब्रिेटेन और फ्रांस, इजराइल से अच्छा सहयोग मिल रहा है। अमेरिका ने कश्मीर में आतंकवाद की जड़ हिजबुल मुजाहिदीन को अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी संगठन घोषित कर यूएन में भारत की राह आसान किया है लेकिन चीन संयुक्तराष्ट संघ में भारत के उस प्रस्ताव का बार-बार वीटो का प्रयोग कर विरोध कर रहा है जिसमें अजहर मसूद को अतंर्राष्ट्रीय आतंकवादी घोषित करने की बात की गई है। इस बार भी वह अड़ंगा लगा कर इस प्रस्ताव को यूएन में खरिज कराने पर तुला है जबकि चीन को छोड़ वीटो के सभी देश भारत की दलील पर सहमत हैं। अभी कुछ  महीने पहले संबंधित आतंकी संगठन के सरगना सैयद सलाउद्दीन को अमेरिका ने ग्लोबल आतंकी घोषित किया था। हाफिज सईद को अमेरिका पहले ही वैश्विक आतंकवादी घोषित कर चुका है। ऐसी स्थिति में भारत वैश्विक आतंकवाद के खिलाफ एक नया माहौल बनाने में कामयाब हुए हैं। यह हमारी सबसे बड़ी कूटनीतिक जीत है। 

लेकिन अमेरिका में हुए लोन वुल्फ अटैक ने भारत की चिंता बढ़ा दी है। क्योंकि अमेरिका के मुकाबले यहाँ इस तरह के हमले बेहद आसान और कम खर्चीले हैं क्योंकि इस तरह के लोन बुल्फ हमलों में आतंकी संगठनो को मामूली पैसे खर्च करने पड़ते हैं। अकेला आतंकी मिशन को कामयाब करता हैं। कम आतंकियों की मौत होती है। बाहर से आतंकियों को भेजने और पकड़े जाने का जोखिम नहीं रहता है। अपनों के बीच का आदमी काम कर जाता है और लोगों को किसी प्रकार की कोई आशंका नहीं होती। घटना के बाद स्थिति और हमले का पता चलता है। अब तक जितने हमले इस तकनीक से हुए हैं उनमें आईएसआई का हाथ रहा है। 

हालांकि जिस तरह से दुनियां भर में इस्लामिक आतंकवाद अपनी जडं़े जमा रहे है, उससे कोई देश सुरक्षित नहीं है। बावजूद आतंकवाद की चुनौती से निपटने के लिए कोई वैश्विक नीति नहीं बन पा रहीं जबकि दुनिया का ऐसा कोई मुल्क नहीं है जो आतंक की विभीषिका न झेल रहा हो लेकिन भारत दुनिया को यह समझाने में कामयाब रहा है कि आतंक किसी का दोस्त नहीं हो सकता। वह अच्छा- बुरा नहीं होता है। वह सिर्फ आतंक होता है। दुनिया को इस चुनौती से निपटने के लिए एक मंच पर आना चाहिए। 

लेखक प्रभुनाथ शुक्ल
 

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